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उत्तराखंड में नदी किनारे बने रिजॉर्ट अब जानलेवा, बुकिंग साइट्स पर दिखेगी ‘खतरे’ की चेतावनी

देहरादून: उत्तराखंड में प्रकृति के बीच स्थित रिजॉर्ट्स में ठहरने का सपना अब पर्यटकों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। राज्य प्रशासन ने नदियों के किनारे अतिक्रमण कर बने रिजॉर्ट्स के खिलाफ सख्त कार्रवाई का रास्ता अपनाया है। जल्द ही बुकिंग डॉट कॉम जैसी लोकप्रिय वेबसाइट्स और सरकारी पोर्टल्स पर इन असुरक्षित रिजॉर्ट्स के लिए विशेष चेतावनी जारी की जाएगी, ताकि पर्यटकों को उनकी जान जोखिम में डालने से रोका जा सके।

सौंग नदी की तबाही ने खोली पोल

इस सख्त कार्रवाई की बड़ी वजह इसी साल 15-16 सितंबर की रात देहरादून के मालदेवता क्षेत्र में आई तबाही है। उस रात सौंग नदी का उफान इतना भयावह था कि नदी किनारे बनी सड़क का एक बड़ा हिस्सा बह गया। जांच में हैरान करने वाला खुलासा हुआ कि ‘स्पर्श एंड फॉर्म’ नामक एक रिजॉर्ट ने नदी की प्राकृतिक धारा का रुख ही बदल दिया था। इस अवैध निर्माण के कारण पानी सीधे सड़क से टकराया और उसे पूरी तरह से बहा ले गया। इस घटना के बाद जिलाधिकारी सविन बंसल ने पूरे जिले के रिजॉर्ट्स की जांच के आदेश दिए, जिनमें से कई अवैध और पर्यटकों के लिए खतरनाक पाए गए।

बुकिंग साइट्स पर दिखेगी यह चेतावनी

प्रशासन ने इन अवैध रिजॉर्ट्स से निपटने के लिए एक अनूठी रणनीति बनाई है। पहले चरण में, इन्हें चिन्हित करके ऑनलाइन बुकिंग वेबसाइट्स पर एक स्पष्ट चेतावनी प्रदर्शित की जाएगी। इस चेतावनी में लिखा होगा: “नदियों की जद में बने रिजॉर्ट्स असुरक्षित हैं, ठहरने से जान-माल का खतरा हो सकता है।” इस कदम का उद्देश्य पर्यटकों को सीधे तौर पर सचेत करना है, जिससे इन रिजॉर्ट्स में बुकिंग अपने आप कम हो जाएंगी। इसके बाद ही प्रशासन इन अतिक्रमणकारी रिजॉर्ट्स को ध्वस्त करने की कार्रवाई शुरू करेगा।

हाईकोर्ट ने भी दिखाई सख्ती

उत्तरकाशी से गोमुख तक इको-सेंसिटिव जोन में अवैध निर्माण

यह समस्या सिर्फ देहरादून तक सीमित नहीं है। उत्तरकाशी से लेकर गोमुख तक फैले भागीरथी इको-सेंसिटिव जोन में भी अवैध रिजॉर्ट्स और होटलों की भरमार है। हिमालयन नागरिक दृष्टि मंच द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश जी. नरेंद्र और न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की खंडपीठ ने उत्तरकाशी के जिलाधिकारी समेत संबंधित अधिकारियों को 3 नवंबर को अदालत में हाजिर होने का आदेश दिया है।

कोर्ट ने सवाल किया है कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के दिशा-निर्देशों का पालन कितना हुआ और बिना उचित सर्वेक्षण के निर्माण की अनुमति क्यों दी गई? याचिकाकर्ता की ओर से दावा किया गया है कि बाढ़ के स्पष्ट खतरे के बावजूद, ‘हिमालयन व्यू’ और ‘प्रकृति के करीब’ होने के लालच में नियमों को ताक पर रखकर निर्माण किए जा रहे हैं।

पर्यटकों के लिए बना स्थायी खतरा

विशेषज्ञ लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि नदियों के किनारे बने ये रिजॉर्ट्स, खासकर मानसून के दौरान, एक गंभीर खतरा हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि साल 2012 में ही पर्यावरण मंत्रालय ने उत्तरकाशी से गंगोत्री तक के 100 किलोमीटर के क्षेत्र को इको-सेंसिटिव जोन घोषित किया था, जहाँ किसी भी निर्माण के लिए एक विशेष समिति की मंजूरी अनिवार्य है। लेकिन लापरवाही और नियमों में ढील के चलते, कई रिजॉर्ट्स बिना किसी मंजूरी के ही बन गए।

यह स्थिति न सिर्फ अनजान पर्यटकों की जान को जोखिम में डालती है, बल्कि हिमालयी पर्यावरण के लिए भी एक गंभीर चुनौती पैदा कर रही है। प्रशासन का यह नया कदम पर्यटक सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण दोनों की दिशा में एक अहम पहल मानी जा रही है।