नैनीताल/देहरादून। (Kafal Tree Live- Uttarakhand News) उत्तराखंड के निजी स्कूलों में बढ़ते शुल्क, महंगी यूनिफॉर्म और किताबों के नाम पर हो रहे शोषण के खिलाफ आखिरकार सरकार ने कदम उठा दिया है। एक बड़ी कार्रवाई करते हुए राज्य सरकार ने एक सलाहकार समिति का गठन किया है, जो अब निजी स्कूलों द्वारा विद्यार्थियों से वसूले जा रहे अत्यधिक फीस और अन्य अनियमितताओं पर नकेल कसेगी। यह फैसला उन हजारों अभिभावकों के लिए एक राहत भरी खबर की तरह है, जो महंगी शिक्षा के बोझ तले दबकर रह गए हैं।
सोमवार को उत्तराखंड हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने यह जानकारी दी। यह मामला हल्द्वानी निवासी दीपचंद्र पांडे द्वारा दायर एक जनहित याचिका से जुड़ा है, जिसमें आरोप लगाया गया था कि प्रदेश के कई निजी स्कूल विद्यार्थियों से बेतहाशा फीस वसूल रहे हैं।
अब अभिभावक कर सकेंगे शिकायत
सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि एक सलाहकार समिति का गठन किया गया है, जहां कोई भी अभिभावक अत्यधिक फीस वसूलने या अन्य किसी तरह के शोषण की शिकायत दर्ज करा सकता है। इस समिति में फीस, वर्दी, खेल, शैक्षणिक यात्राओं और स्कूलों द्वारा विद्यार्थियों को किताबें एक ही दुकान से खरीदने के लिए बाध्य करने जैसे मुद्दों की जांच की जाएगी।
नैनीताल के मुख्य शिक्षा अधिकारी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अदालत में हाजिर होकर इस समिति के गठन की पुष्टि की।
“सत्र शुरू होने” के नाम पर चल रहा था धंधा?
याचिकाकर्ता की तरफ से अदालत में आरोप लगाया गया कि स्कूल प्रबंधन विद्यार्थियों को नोटबुक, किताबें और वर्दी खास दुकानों से खरीदने के लिए मजबूर करते हैं, जहां बाजार भाव से कहीं अधिक कीमतें वसूली जाती हैं। इससे अभिभावकों को काफी आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
हालांकि, स्कूल प्रबंधनों की ओर से दलील दी गई कि सारी किताबें और सामान एक ही जगह उपलब्ध कराने का मकसद अभिभावकों को अलग-अलग दुकानों के चक्कर न लगाना पड़े और शैक्षणिक सत्र समय पर शुरू हो सके। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह सुविधा के नाम पर मनमाने दाम थोपने का एक तरीका भर तो नहीं है?
सीबीएसई ने क्या कहा?
इस पूरे मामले में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने अदालत को साफ कर दिया कि उसे अब तक किसी भी विद्यार्थी या अभिभावक की ओर से इस तरह की कोई शिकायत नहीं मिली है। यह बयान एक तरह से स्थानीय स्तर पर हो रही अनियमितताओं को ही रेखांकित करता है।
अदालत ने क्या दिया निर्देश?
न्यायमूर्ति रवीन्द्र मैथानी और न्यायमूर्ति आलोक महरा की खंडपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह पहले अपनी शिकायत नवगठित सलाहकार समिति के समक्ष रखें। इसके बाद मामले को निस्तारित कर दिया गया।
आम आदमी की जीत की एक कहानी
उत्तराखंड सरकार का यह कदम निश्चित तौर पर शिक्षा के क्षेत्र में पारदर्शिता और न्याय की दिशा में एक सराहनीय प्रयास है। यह फैसला उन तमाम अभिभावकों के लिए एक उम्मीद की किरण है, जो निजी स्कूलों की मनमानी के आगे बेबस नजर आ रहे थे। अब देखना यह है कि यह समिति कितनी कारगर साबित होती है और क्या वाकई अभिभावकों को इसका ठोस लाभ मिल पाता है। एक बात तो तय है, शिक्षा व्यवसाय नहीं, एक जिम्मेदारी है और अब इस जिम्मेदारी का निर्वहन सभी को करना होगा।
यह खबर Kafal Tree Live के लिए विशेष रूप से तैयार की गई है। शिक्षा से जुड़ी ताजा अपडेट के लिए बने रहें हमारे साथ।


