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पंचायत सदस्यों के अपहरण मामले में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने CID को लगाई फटकार, अगली सुनवाई तक रिपोर्ट दाखिल करने के दिए सख्त निर्देश

नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 14 अगस्त को हुए नैनीताल जिला पंचायत अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुनाव के दौरान पांच जिला पंचायत सदस्यों के कथित अपहरण (Alleged Abduction of Panchayat Members) मामले में प्रगति रिपोर्ट (Progress Report) दाखिल करने में विफल रहने पर राज्य सीआईडी (CID) को खरी-खरी सुनाई है।

मुख्य न्यायाधीश जी. नरेंद्र और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने पहले के निर्देशों के बावजूद फरार आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई न होने पर असंतोष जताया। अदालत ने राज्य सरकार को 17 अक्टूबर, जो कि अगली सुनवाई की तारीख है, तक एक विस्तृत प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।

अदालत का सख्त रुख, चार एफआईआर के बावजूद जांच में नाकामी पर नाराजगी

बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान सरकारी प्रतिनिधियों और चार जांच अधिकारियों ने पीठ के समक्ष पेश होकर बताया कि इस घटना से जुड़ी चार एफआईआर (FIRs Registered) दर्ज की गई हैं। हालांकि, पीठ इससे संतुष्ट नहीं हुई और जांच की वर्तमान स्थिति (Current Status of Investigation) पर विशेष विवरण मांगा।

याचिकाकर्ताओं ने राज्य की और समय मांगने की याचिका का विरोध किया और तर्क दिया कि अब तक मामले की सीआईडी द्वारा की गई जांच (CID Investigation) से असंतुष्ट होकर जांच एक उच्च-स्तरीय एजेंसी (Higher-Level Agency) को सौंपी जानी चाहिए। अदालत ने इस तथ्य पर गौर किया कि चुनाव होने के दो महीने बाद भी कोई रिपोर्ट दाखिल नहीं की गई थी और सरकार को मामले में उठाए गए कदमों का व्यापक ब्योरा (Comprehensive Account of Steps Taken) देने का निर्देश दिया।

कांग्रेस के आरोप और चुनावी घटनाक्रम

यह विवाद कांग्रेस पार्टी के उन आरोपों से उपजा है, जिसमें दावा किया गया था कि नैनीताल जिला पंचायत के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पदों (Nainital District Panchayat President and Vice President Elections) के लिए हुए महत्वपूर्ण चुनाव में मतदान करने से रोकने के लिए उसके पांच जिला पंचायत सदस्यों का अपहरण किया गया था। बाद में हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप किया, जिससे अपहृत सदस्य सुरक्षा व्यवस्था (Security Arrangements) के तहत मतदान करने में सक्षम हुए।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी (Chief Minister Pushkar Singh Dhami) ने इस घटना में दर्ज सभी एफआईआर की सीबीआई-सीआईडी द्वारा गहन जांच (Thorough Investigation by CBI-CID) कराने की बात कही थी। हालांकि, अदालत के सामने अब तक जांच की स्थिति संतोषजनक नहीं पाई गई है।

लोकतंत्र में अवरोध की घटना, अदालत का सक्रिय हस्तक्षेप

यह मामला लोकतांत्रिक प्रक्रिया (Democratic Process) में गंभीर अवरोध पैदा करने वाली घटना के रूप में सामने आया है। निर्वाचित जनप्रतिनिधियों का अपहरण कर उन्हें मतदान से रोकना लोकतंत्र के मूलभूत सिद्धांतों के खिलाफ माना जा रहा है। अदालत का हस्तक्षेप इस मामले में न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है, जिसने मतदान के अधिकार (Right to Vote) को सुनिश्चित किया।

अब न्यायालय का ध्यान इस बात पर केंद्रित है कि घटना के पीछे जिम्मेदार लोगों को कानून के समक्ष लाया जाए और भविष्य के लिए एक संदेश जाए कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। 17 अक्टूबर को अगली सुनवाई में सीआईडी द्वारा पेश की जाने वाली रिपोर्ट इस मामले की भावी दिशा तय करेगी। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या सीआईडी अपनी जांच को तेजी से आगे बढ़ाती है या फिर याचिकाकर्ताओं की मांग के अनुरूप जांच किसी अन्य एजेंसी को सौंपी जाती है।