Homeकुमाऊँउत्तराखंड धर्मांतरण कानून: 7 साल में 5 मुकदमे, सभी में बरी हुए...

उत्तराखंड धर्मांतरण कानून: 7 साल में 5 मुकदमे, सभी में बरी हुए आरोपी

उत्तराखंड में कथित जबरन धर्मांतरण को रोकने के लिए बनाए गए कानून को लागू हुए लगभग सात साल हो चुके हैं, लेकिन अदालतों के रिकॉर्ड कुछ और ही तस्वीर पेश करते हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, अब तक इस कानून के तहत जिन पांच मामलों में पूरा ट्रायल हुआ, उन सभी में आरोपियों को बरी कर दिया गया

यह जानकारी द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच में सामने आई है, जिसमें आरटीआई के जरिए अदालतों और पुलिस से मिले रिकॉर्ड का विश्लेषण किया गया।

अब तक कितने मामले दर्ज हुए

वर्ष 2018 में भाजपा सरकार द्वारा लागू किए गए उत्तराखंड फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट (UFRA) के तहत अब तक कुल 62 मामले दर्ज किए जा चुके हैं। इनमें से 51 मामलों का रिकॉर्ड 13 जिलों से प्राप्त हुआ है। सितंबर 2025 तक इनमें सिर्फ पांच मामलों में ही पूरा ट्रायल हुआ, और सभी में फैसला आरोपियों के पक्ष में गया।

इसके अलावा, कम से कम सात मामले बीच में ही खारिज कर दिए गए। इसकी मुख्य वजहें रहीं—शिकायतकर्ता का बयान बदल जाना, ठोस सबूतों की कमी और यह साबित न हो पाना कि धर्मांतरण जबरदस्ती या लालच से कराया गया था।

ज्यादातर आरोपी जमानत पर

बाकी बचे 39 मामलों में से लगभग तीन-चौथाई आरोपियों को जमानत मिल चुकी है। इनमें 11 को उत्तराखंड हाईकोर्ट से और एक को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली।
कुछ मामलों में जमानत याचिकाओं पर सुनवाई चल रही है, जबकि दो मामलों में हाईकोर्ट ने कार्यवाही पर रोक लगाते हुए राज्य सरकार से जवाब मांगा है।

अदालतों ने कई बार जमानत देते हुए यह भी कहा कि मामले आपसी सहमति वाले रिश्तों, विरोधाभासी बयानों या जांच में हुई प्रक्रियागत गलतियों से जुड़े हैं।

इंटरफेथ शादी का मामला बना उदाहरण

बरी होने वाले मामलों में एक अहम मामला अमन सिद्दीकी उर्फ अमन चौधरी से जुड़ा है। यह शादी दोनों परिवारों की सहमति से हुई थी और हलफनामे में साफ कहा गया था कि महिला धर्म परिवर्तन नहीं करेगी। इसके बावजूद अमन को करीब छह महीने जेल में रहना पड़ा।

19 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने अमन को जमानत देते हुए कहा कि राज्य सरकार को ऐसी शादी पर आपत्ति नहीं हो सकती, जो दोनों की मर्जी और परिवारों की सहमति से हुई हो। बाद में हाईकोर्ट ने भी निचली अदालत की कार्यवाही पर रोक लगा दी।

कानून को बार-बार सख्त किया गया

यह कानून 2018 में लागू हुआ था। इसके बाद

  • 2022 में सजा बढ़ाई गई
  • 2025 में सजा 10 साल तक, और कुछ मामलों में आजीवन कारावास तक करने का प्रावधान जोड़ा गया

हालांकि 2025 का संशोधन अभी लागू नहीं हो पाया है, क्योंकि राज्यपाल ने इसे तकनीकी खामियों के चलते वापस भेज दिया है।

इस कानून का उद्देश्य कथित तौर पर धोखे, दबाव, लालच या शादी के जरिए कराए जाने वाले धर्मांतरण को रोकना है।

शिकायतें बढ़ीं, लेकिन सबूत कमजोर

रिकॉर्ड बताते हैं कि 2022 के संशोधन के बाद मामलों की संख्या तेजी से बढ़ी।

  • 2023 में सबसे ज्यादा 20 मामले दर्ज हुए
  • 2025 में सितंबर तक 18 मामले सामने आ चुके थे

लेकिन अदालतों में ज्यादातर मामलों में सबूत टिक नहीं पाए

तीसरे पक्ष की शिकायतें भी सवालों में

पांच में से दो मामलों में शिकायत ऐसे लोगों ने दर्ज कराई, जो सीधे तौर पर कथित धर्मांतरण से प्रभावित नहीं थे। एक मामले में फेसबुक वीडियो के जरिए ईसाई धर्म का प्रचार करने का आरोप लगाया गया, लेकिन अदालत ने कहा कि किसी को धर्म मानने, अपनाने और प्रचार करने का अधिकार है, जब तक इससे दूसरों के अधिकार प्रभावित न हों।

एक अन्य मामले में पादरी नरेंद्र सिंह बिष्ट और उनकी पत्नी पर सामूहिक धर्मांतरण का आरोप लगा, लेकिन अदालत ने यह कहते हुए बरी कर दिया कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि कब, कैसे और किसे लालच देकर धर्मांतरण कराया गया।

बयान बदले, आरोप ढह गए

कई मामलों में

  • महिलाओं ने अपने शुरुआती बयान बदल दिए
  • अदालतों ने माना कि संबंध आपसी सहमति से थे
  • अपहरण, दुष्कर्म और जबरन धर्मांतरण के आरोप साबित नहीं हो सके

कुछ मामलों में अदालतों ने यह भी कहा कि शिकायतें सुनी-सुनाई बातों पर आधारित थीं।

पुलिस की चुप्पी

इस पूरे मुद्दे पर उत्तराखंड पुलिस ने टिप्पणी करने से इनकार किया है, जबकि उनसे कई बार संपर्क किया गया।

बड़ा सवाल

लगातार बढ़ते मामलों और कड़े प्रावधानों के बावजूद अदालतों में टिक न पाने वाले आरोपों ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—
क्या धर्मांतरण कानून का इस्तेमाल जांच और सबूतों के बजाय शक और सामाजिक दबाव के आधार पर किया जा रहा है?