हरिद्वार/देहरादून: उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों से हो रहे पलायन को रोकने के लिए एक नई पहल उम्मीद जगाती दिख रही है। पतंजलि द्वारा विकसित ‘चंदन वन’ मॉडल ने यह साबित किया है कि अनुकूल परिस्थितियों में उत्तर भारत में भी चंदन की सफल खेती संभव है। राज्य के कई जिलों में इसके सकारात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं।
करीब दो दशक पहले पतंजलि के महासचिव आचार्य बालकृष्ण ने हरिद्वार में चंदन की खेती पर प्रयोग शुरू किए थे। उस समय उत्तर भारत में चंदन उत्पादन लगभग न के बराबर था। पतंजलि के शोध केंद्र और औषधीय उद्यान में लगाए गए पौधों पर किए गए अध्ययन उत्साहजनक रहे, जिसके बाद राज्य के विभिन्न जिलों में किसानों ने इस मॉडल को अपनाना शुरू किया।
विशेषज्ञों के अनुसार चंदन एक अर्ध-परजीवी वृक्ष है, जिसे विकसित होने के लिए आसपास के पौधों की जड़ों से पोषण की आवश्यकता होती है। इसलिए इसकी खेती वैज्ञानिक तरीके और उचित प्रबंधन पर निर्भर करती है।
इस पहल की शुरुआत तब हुई जब आचार्य बालकृष्ण को मणिकूट पर्वत क्षेत्र में चंदन के पेड़ों के अस्तित्व से जुड़ी जानकारी मिली। इसके बाद उन्होंने वैज्ञानिक जांच कराई, जिसमें सीमित संख्या में चंदन के पेड़ों की पुष्टि हुई। इसके आधार पर हरिद्वार और आसपास के क्षेत्रों में पौधारोपण शुरू किया गया, जो कुछ ही वर्षों में ‘चंदन वन’ के रूप में विकसित हो गया। बाद में पौड़ी जैसे जिलों में भी यह प्रयोग सफल रहा।
IIT Roorkee में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान आचार्य बालकृष्ण ने बताया कि पहाड़ों से रोजगार के लिए हो रहे पलायन को स्थानीय संसाधनों के सही उपयोग से रोका जा सकता है। उन्होंने यमकेश्वर क्षेत्र का उदाहरण देते हुए बताया कि जहां पहले बंजर जमीन थी, वहां अब हरियाली से भरपूर चंदन वन विकसित हो चुका है।
इस दौरान योगी आदित्यनाथ ने भी क्षेत्र का दौरा किया और परिवर्तन को देखकर आश्चर्य जताया। उन्होंने माना कि जिस भूमि पर पहले कुछ नहीं उगता था, वहां अब घना वन तैयार हो गया है।
आचार्य बालकृष्ण के अनुसार, यदि इस मॉडल को बड़े स्तर पर अपनाया जाए तो बंजर जमीन को उपजाऊ बनाया जा सकता है और किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। चंदन का पेड़ लगभग 10 से 15 वर्षों में तैयार होता है और प्रति पेड़ 1 से 1.5 लाख रुपये तक की आय दे सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की पहल न केवल किसानों के लिए स्थायी आजीविका के अवसर पैदा कर सकती है, बल्कि उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों से पलायन को रोकने में भी अहम भूमिका निभा सकती है।


