उत्तराखंड का मोहक हिल स्टेशन मसूरी, जो अपने लुभावने पहाड़ी नज़ारों, हरियाली और शांत वातावरण के लिए दुनियाभर में मशहूर है, अब एक गंभीर खतरे से जूझ रहा है। एक ताजा अध्ययन ने इस बात पर चिंता जताई है कि मसूरी और उसके आसपास का करीब 15% इलाका भूस्खलन की ‘उच्च-जोखिम वाली ज़ोन’ में आता है। यह स्थिति अव्यवस्थित निर्माण, भारी सड़क निर्माण और वनों की कटाई के कारण पैदा हुई है।
वैज्ञानिकों की चेतावनी
देहरादून स्थित वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी (WIHG) के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक नए अध्ययन ने मसूरी के भविष्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वैज्ञानिकों ने मध्य हिमालयी क्षेत्र के 84 वर्ग किलोमीटर के दायरे का अध्ययन किया और पाया कि शहर के कई हिस्से धंस रहे हैं या फिर ढलान के अस्थिर होने (Slope Failure) का खतरा बढ़ गया है।
अध्ययन दल की अगुवाई कर रहे डॉ. अनिल जोशी ने स्पष्ट किया कि इलाके में हो रही बढ़ती निर्माण गतिविधियों और मानवीय दबाव को अब यह क्षेत्र बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है।
कौन-से इलाके हैं सबसे अधिक खतरे में?
शोधकर्ताओं ने मसूरी के कई प्रमुख और लोकप्रिय स्थानों को सबसे अधिक संवेदनशील पाया है। इनमें शामिल हैं:
- भट्टाघाट
- जॉर्ज एवरेस्ट (पीक)
- कैम्प्टी फॉल का क्षेत्र
- खट्टा पानी
- लाइब्रेरी रोड
- गलोगीधार
- हाथीपांव
ये सभी स्थान न केवल स्थानीय लोगों के रहने की जगह हैं बल्कि पर्यटकों के बीच भी अत्यधिक लोकप्रिय हैं। इन क्षेत्रों में भूस्खलन का खतरा सबसे ज्यादा बताया गया है।
प्रकृति और मानवीय गतिविधियाँ: दोहरी मार
अध्ययन के मुताबिक, मसूरी की भूगर्भिक संरचना ही इसे भूस्खलन के निरंतर खतरे में डालने की एक बड़ी वजह है। यह शहर ‘क्रोल लाइमस्टोन’ चट्टानों पर बसा हुआ है, जो स्वभाव से कमजोर, दरारों वाली और अधिक वजन सहन नहीं कर पाने वाली हैं। साथ ही, यहाँ के कई ढलान 60 डिग्री से भी अधिक खड़े हैं, जो उन्हें भूस्खलन के प्रति और अधिक संवेदनशील बनाते हैं।
वैज्ञानिकों ने माना कि दशकों से चल रहे अव्यवस्थित निर्माण, बेतहाशा सड़कों के चौड़ीकरण और कटान के लिए की जा रही विस्फोटकों के इस्तेमाल, और बड़े पैमाने पर वनों की कटाई ने इस समस्या को और विकराल बना दिया है।
कैसे किया गया अध्ययन?
इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने आधुनिक तकनीकों जैसे ज्योग्राफिक इन्फॉर्मेशन सिस्टम (GIS) और हाई-रिज़ॉल्यूशन सैटेलाइट इमेजरी का इस्तेमाल किया। इनकी मदद से उन्होंने एक विस्तृत ‘लैंडस्लाइड ससेप्टिबिलिटी मैप’ (Landslide Susceptibility Map – LSM) तैयार किया। इस नक्शे को बनाने के लिए चट्टानों के प्रकार, भूमि उपयोग, ढलान की प्रवृत्ति और जल निकासी पैटर्न जैसे कारकों का गहनता से विश्लेषण किया गया।
अंतिम नतीजे बताते हैं कि अध्ययन क्षेत्र का 56% हिस्सा कम जोखिम, 29% हिस्सा मध्यम जोखिम और 15% हिस्सा उच्च जोखिम वाली श्रेणी में आता है।
मसूरी की यह स्थिति न केवल स्थानीय निवासियों के लिए बल्कि लाखों देशी-विदेशी सैलानियों के लिए भी चिंता का विषय है। यह मामला सिर्फ एक हिल स्टेशन का नहीं, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र में हो रहे अंधाधुंध विकास और उसके दुष्परिणामों की ओर इशारा करता है। जरूरत इस बात की है कि प्रशासन और स्थानीय समुदाय मिलकर सतत विकास की नीतियों को अपनाएं, सख्त निर्माण नियमों को लागू करें और पर्यावरण संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दें।


