देहरादून। मध्य हिमालय क्षेत्र पर एक नया संकट मंडरा रहा है। मिजोरम विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विश्वंभर प्रसाद सती और सुरजीत बनर्जी के एक ताजा और चिंताजनक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि लैटिन अमेरिका मूल का आक्रामक खरपतवार लैंटाना कैमारा उत्तराखंड की पारिस्थितिकी और कृषि के लिए सबसे बड़ा खतरा बनता जा रहा है।
उत्तराखंड वन विभाग द्वारा ढाई दशकों से चले उन्मूलन अभियान के बावजूद इस खरपतवार का फैलाव 93 प्रतिशत तक बढ़ चुका है। एनवायरनमेंटल मॉनिटरिंग एंड असेसमेंट पत्रिका में प्रकाशित यह शोध बताता है कि लैंटाना अब शिवालिक और हिमाचल पर्वतमाला की मध्यवर्ती ऊंचाइयों (900 से 2,000 मीटर) को भी अपनी चपेट में ले रहा है।
प्रोफेसर सती के अनुसार, “न्यूनतम तापमान में वृद्धि और वर्षा की अनिश्चितता लैंटाना को फलने-फूलने का मौका दे रही है।” चमोली, उत्तरकाशी, अल्मोड़ा और नैनीताल जैसे इलाके, जो पहले पाले की वजह से इस पौधे से सुरक्षित थे, अब इसके लिए अनुकूल होते जा रहे हैं।
लैंटाना सूखे को सहने में सक्षम है, जबकि देसी घास और पौधे सर्दियों में सूख जाते हैं। यह खरपतवार न केवल स्थानीय वनस्पतियों को खत्म कर रहा है, बल्कि घने और आग पकड़ने वाले झाड़ीदार जंगल बना रहा है, जो वनाग्नि का खतरा बढ़ाते हैं। औषधीय पौधों की वृद्धि भी बुरी तरह प्रभावित हो रही है।
प्रोफेसर सती ने यह भी बताया कि लैंटाना की घनी झाड़ियां तेंदुओं जैसे वन्यजीवों को छुपने की जगह दे रही हैं, जिससे जंगल के किनारे बसे गांवों में मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ रहा है।
जलवायु मॉडलिंग के आधार पर शोधकर्ताओं ने चेताया है कि यदि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन इसी तरह जारी रहा तो लैंटाना का फैलाव 173 प्रतिशत तक बढ़ सकता है और 2050 तक उत्तराखंड का 40 प्रतिशत हिस्सा इसकी चपेट में आ सकता है। वनों की कटाई और सड़क किनारे खरपतवार का अनुचित निपटान इस संकट को और गहरा कर रहा है।
शोधकर्ताओं ने सरकार और वन विभाग से आग्रह किया है कि बिना देर किए वैज्ञानिक और समन्वित रणनीति अपनाई जाए, वरना हिमालय का पारिस्थितिक स्वरूप हमेशा के लिए बदल सकता है।


