अक्टूबर की शुरुआत में ही उत्तर भारत के राज्यों में हवा में एक अजीब सी ठंडक महसूस होने लगी है। रातें खासतौर पर ठंडी हो रही हैं, लोग पंखे की स्पीड कम कर रहे हैं और रात को चादर ओढ़कर सो रहे हैं। यह मौसमी बदलाव 2020 की याद दिला रहा है, जब दिल्ली ने 1962 के बाद का सबसे ठंडा अक्टूबर महीना Record किया था। मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि इस साल की शुरुआती ठंड ला नीना (La Niña) नामक जलवायु घटना का संकेत हो सकती है, जो भारत को दशकों की सबसे ठंडी सर्दी दे सकती है।
क्या है ला नीना?
ला नीना एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जो एल नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO) चक्र का ठंडा चरण माना जाता है। यह चक्र हर 2 से 7 साल में प्रशांत महासागर के Equatorial इलाके में समुद्र की सतह के तापमान में बदलाव के कारण घटित होता है।
- एल नीनो (El Niño): इस दौरान प्रशांत महासागर का पानी गर्म हो जाता है, जिससे भारत में मानसून कमजोर पड़ सकता है और सूखे की स्थिति बन सकती है।
- ला नीना (La Niña): यह एल नीनो के ठीक उलट है। इस दौरान प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से अधिक ठंडा हो जाता है। इसका असर भारत में अक्सर ठंडी और कड़ाके की सर्दी, भारी बर्फबारी के रूप में देखने को मिलता है।
- न्यूट्रल फेज: यह सामान्य स्थिति होती है, जिसमें मौसम पैटर्न पर कोई Extreme प्रभाव नहीं पड़ता।
इस सर्दी पर क्या पड़ेगा असर?
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) समेत वैश्विक मौसम एजेंसियों ने इस सर्दी में ला नीना की स्थिति बनने की अधिक संभावना जताई है। इसके मुख्य प्रभाव कुछ इस तरह दिख सकते हैं:
- पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) मजबूत होंगे: ला नीना की स्थिति में उत्तर भारत में पश्चिमी विक्षोभों की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ जाती है। इससे हिमालयी क्षेत्रों जैसे जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में सामान्य से अधिक बर्फबारी हो सकती है।
- ठंडी हवाओं का प्रवाह: साइबेरिया और मध्य एशिया से आने वाली ठंडी हवाएं उत्तर भारत में और गहराई तक प्रवेश करती हैं, जिससे ठंड की लहर (Cold Wave) की स्थिति बन सकती है।
- तापमान में गिरावट: अक्टूबर में ही अधिकतम और न्यूनतम तापमान में रिकॉर्ड गिरावट देखी गई है। यह संकेत है कि आने वाले महीनों में तापमान और गिर सकता है।
- उत्तर-पूर्वी मानसून पर असर: ला नीना तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश के तटीय इलाकों में सामान्य से अधिक बारिश का कारण भी बन सकता है।
क्या हर ला नीना सर्दी ठंडी ही लाता है?
जरूरी नहीं। हाल के वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि ला नीना और कड़ाके की ठंड के बीच का संबंध हमेशा सीधा नहीं होता।
भारतीय उष्णदेशीय मौसम विज्ञान संस्थान (IITM) के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक के अनुसार, “2020 से 2024 तक, ला नीना की लंबी अवधि के बावजूद, भारत के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से अधिक तापमान दर्ज किया गया। 2023 और 2024 की सर्दियाँ भी ला नीना के प्रभाव में होने के बावजूद गर्म रहीं।”
आईएमडी के वैज्ञानिक डॉ. ओ.पी. श्रीजित का कहना है कि “हिमालय जैसी भौगोलिक बनावट, जो ध्रुवीय हवाओं को रोकती है, के कारण हाल के वर्षों में ला नीना और सख्त सर्दियों के बीच कोई सीधा संबंध नहीं देखा गया है।”
जलवायु परिवर्तन की भूमिका
विश्व मौसम संगठन (WMO) का कहना है कि मानव-जनित जलवायु परिवर्तन (Climate Change) ने इन प्राकृतिक घटनाओं के प्रभाव को और जटिल बना दिया है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण समग्र तापमान बढ़ रहा है, जो कभी-कभी ला नीना के ठंडे प्रभावों को कम कर सकता है, जैसा कि हाल के वर्षों में देखा गया है।
हालांकि यह जरूरी नहीं कि ला नीना हमेशा कड़ाके की ठंड ही लाए, लेकिन इस साल मौसम विभाग और वैश्विक मॉडल मजबूत संकेत दे रहे हैं। ऐसे में, उत्तर भारत के निवासियों, खासकर किसानों और स्वास्थ्य सेवाओं को, एक लंबी और ठंडी सर्दी के लिए तैयार रहना चाहिए। सर्दियों की फसलों की योजना, स्वास्थ्य संबंधी तैयारियाँ (खासकर सर्दी-जुकाम और फेफड़ों के रोगों के लिए) और ठंड से बचाव के उपायों पर ध्यान देना इस सर्दी में और भी जरूरी हो गया है।


