हमारी हिन्दू संस्कृति में जानवरों को विशेष स्थान दिया गया है और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता जताने की परंपरा रही है। नेपाल में मनाए जाने वाले दीपावली के दूसरे दिन ‘कुकुर पूजा’ या ‘Kukur Tiyar’ इसी भावना का एक सुंदर और अनूठा उदाहरण है। यह वह दिन है जब कुत्तों को भगवान का दर्जा देकर उनकी पूजा की जाती है। आइए, इस रोचक और हृदयस्पर्शी परंपरा को विस्तार से जानते हैं।
क्या है कुकुर पूजा? (What is Kukur Tiyar?)
कुकुर पूजा नेपाल के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण त्योहार ‘तिहार’ या ‘दीपावली’ के पांच दिनों में से दूसरे दिन मनाई जाती है। इसे ‘नरक चतुर्दशी’ के दिन के रूप में भी जाना जाता है। इस दिन कुत्तों को भगवान का प्रतीक मानकर उनका सम्मान और पूजन किया जाता है। चाहे वह पालतू कुत्ता हो या आवारा, सभी को इस दिन समान रूप से सम्मानित किया जाता है।
कुकुर पूजा का धार्मिक और पौराणिक महत्व (Religious and Mythological Significance of Kukur Tiyar)
इस परंपरा के पीछे कई धार्मिक मान्यताएं और पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं।
- भगवान यमराज और उनके कुत्ते का संबंध: हिन्दू मान्यताओं के अनुसार, यमराज (मृत्यु के देवता) के पास एक कुत्ता है जो उनका वाहन और संरक्षक है। माना जाता है कि इसी कुत्ते का स्वरूप धरती पर मौजूद सभी कुत्तों में विद्यमान है। इसलिए कुकुर पूजा करने से यमराज प्रसन्न होते हैं और मृत्यु के बाद मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
- महाभारत की कथा: महाभारत में एक प्रसंग आता है जब युधिष्ठिर अपने अंतिम समय में स्वर्ग जाते समय एक कुत्ते को अपने साथ ले जाते हैं। वह कुत्ता बाद में धर्मराज का रूप धारण करता है। इस कथा से कुत्ते की निष्ठा और उसके दिव्य स्वरूप का पता चलता है।
- भैरव का अवतार: हिन्दू धर्म में कुत्ते को भगवान भैरव (शिव का रौद्र रूप) का वाहन माना जाता है। इस नाते भी कुत्तों को दिव्य और पूजनीय माना जाता है।
कुकुर पूजा कैसे मनाई जाती है? (How is Kukur Tiyar Celebrated?)
कुकुर पूजा का समारोह बेहद खूबसूरत और दिल को छू लेने वाला होता है। इस दिन की रस्में कुत्ते के प्रति प्रेम और सम्मान से भरपूर होती हैं:
- टीका और फूलों की माला: सबसे पहले कुत्ते का स्वागत एक अतिथि की तरह किया जाता है। उसके माथे पर लाल रंग का टीका (चावल, दही और सिंदूर से बना) लगाया जाता है। इसके बाद उसके गले में ‘माला’ यानी फूलों की माला (गेन्दे के फूलों की) पहनाई जाती है। यह टीका और माला सम्मान और शुभकामना का प्रतीक है।
- धूपबत्ती और दीप: कुत्ते की पूजा करते समय उसके सामने धूपबत्ती जलाई जाती है और दीप जलाकर आरती की जाती है, ठीक वैसे ही जैसे किसी देवता की पूजा की जाती है।
- विशेष भोजन (लेखी): इस दिन कुत्तों को उनका पसंदीदा और स्वादिष्ट भोजन परोसा जाता है। लोग उन्हें दूध, अंडे, मीट और उच्च गुणवत्ता वाला डॉग फूड खिलाते हैं। इस विशेष भोजन को ‘लेखी’ कहा जाता है। यह कृतज्ञता और देखभाल का प्रतीक है।
- आवारा कुत्तों की भी पूजा: इस त्योहार की सबसे सुंदर बात यह है कि इसमें पालतू और आवारा कुत्तों के बीच कोई भेदभाव नहीं किया जाता। गली-मोहल्ले के हर कुत्ते को टीका लगाकर, माला पहनाकर और अच्छा भोजन कराया जाता है।
कुकुर पूजा से जुड़ा सामाजिक संदेश (Social Message of Kukur Puja)
कुकुर पूजा सिर्फ एक धार्मिक रस्म नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक गहरा सामाजिक और पर्यावरणीय संदेश छिपा है। यह त्योहार हमें सिखाता है कि:
- मनुष्य और जानवरों के बीच सह-अस्तित्व और सद्भावना का संबंध होना चाहिए।
- कुत्ते मनुष्य के सबसे वफादार साथी हैं और उनके प्रति हमारी जिम्मेदारी बनती है।
- प्रकृति और उसके सभी जीवों का सम्मान करना हमारा धर्म है।
- यह त्योहार जानवरों के प्रति दया और प्रेम की भावना को बढ़ावा देता है।
नेपाल की कुकुर पूजा दुनिया भर में अपनी अनूठी परंपरा के लिए जानी जाती है। यह त्योहार हमें यह याद दिलाता है कि ईश्वर सिर्फ मंदिरों की मूर्तियों में ही नहीं, बल्कि हमारे आस-पास के हर एक प्राणी में बसता है। कुत्ते की निष्ठा और सेवा भाव को सम्मान देने का यह पर्व हमारी संस्कृति की उदारता और गहन चिंतन का प्रतीक है। अगली बार जब आप एक कुत्ते को देखें, तो उसके प्रति स्नेह और सम्मान का भाव जरूर रखें, क्योंकि वह सिर्फ एक जानवर नहीं, बल्कि हमारा एक विश्वसनीय साथी है।


