नेवातिम, इजराएल। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान यहूदी शरणार्थियों और असहाय पोलिश बच्चों को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले भारतीय राजा, गुजरात के महाराजा जम साहिब दिग्विजयसिंहजी की प्रतिमा का सोमवार को इजराएल के नेवातिम शहर में अनावरण किया गया। यह सम्मान भारत–इजराएल ऐतिहासिक संबंधों और मानवीय परंपराओं के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है।
आईसीसीआर और इजराएल के सामाजिक संगठन की ओर से आयोजित कार्यक्रम में कई उच्च स्तरीय प्रतिनिधि मौजूद रहे। समारोह के दौरान महाराजा दिग्विजयसिंहजी के मानवतावादी कार्यों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि उन्होंने युद्धकाल में जान जोखिम में डालकर हजारों लोगों की मदद की थी, जिनमें से कई यहूदी भी थे।
द्वितीय विश्वयुद्ध में बचाई थीं हजारों जानें
वर्ष 1942 में पोलैंड पर नाजियों के हमले के बाद कई यहूदी परिवार और सैकड़ों पोलिश बच्चे विस्थापित हो गए थे। ऐसे कठिन दौर में महाराजा जम साहिब ने न केवल उनके लिए दरवाजे खोले बल्कि उन्हें अपने राज्य में सुरक्षित रहने और शिक्षा–जीवनयापन की सभी सुविधाएँ भी प्रदान कीं।
उन्होंने 600 से अधिक पोलिश बच्चों को अपने संरक्षण में लिया, जिन्हें बाद में दुनिया भर में “जमनगर के बच्चे” के नाम से जाना गया। इजराएल समुदाय इस योगदान को आज भी गहरी श्रद्धा और सम्मान से याद करता है।
इजराएल में भारत के प्रति सम्मान का प्रतीक
प्रतिमा अनावरण समारोह में वक्ताओं ने महाराजा दिग्विजयसिंहजी को “मानवता का सच्चा रक्षक” बताया। इजराएल के अधिकारियों ने कहा कि उस कठिन समय में भारत द्वारा दिया गया सहयोग उनकी राष्ट्रीय स्मृतियों में हमेशा दर्ज रहेगा।
कार्यक्रम में यह भी उल्लेख किया गया कि यह प्रतिमा भारत और इजराएल के बीच सदियों पुराने संबंधों को और मजबूत करेगी। इसे नेवातिम एयरबेस परिसर में स्थापित किया गया है, जहां बड़ी संख्या में स्थानीय लोग और प्रवासी भारतीय इसे देखने पहुँचे।
मानवीय मूल्यों की अनोखी मिसाल
महाराजा दिग्विजयसिंहजी का जीवन विश्व इतिहास में एक अनूठी मिसाल के रूप में जाना जाता है। युद्ध और हिंसा के समय भी उन्होंने करुणा, साहस और मानवीय संवेदना को प्राथमिकता दी।
इजराएल में लगी यह प्रतिमा न केवल उनके अमिट योगदान की याद दिलाती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि मानवता की रक्षा के लिए उठाए गए कदम सीमाओं से परे जाकर भी सम्मानित होते हैं।


