नैनीताल: जलवायु परिवर्तन, कमजोर बुनियादी सुविधाओं और असंतुलित विकास के कारण उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों से पलायन अब केवल रोजगार की तलाश तक सीमित नहीं रह गया है। परिवार स्थायी रूप से गांव छोड़कर मैदानी क्षेत्रों में बस रहे हैं, जिससे पहाड़ों में बंद घर, बंजर खेत और बढ़ती संख्या में ‘भूतिया गांव’ (घोस्ट विलेज) दिखाई देने लगे हैं। यह चेतावनी IIT मद्रास के एक नए अध्ययन में दी गई है।
“फ्रॉम पहाड़ टू मैदान: क्लाइमेट चेंज एंड सोशियो-इकोनॉमिक डायनेमिक्स ऑफ आउट-माइग्रेशन इन द उत्तराखंड हिमालयाज” शीर्षक से प्रकाशित इस अध्ययन को शोधार्थी आयुष शाह तुलघरिया और प्रोफेसर कृष्णा मलाकर ने तैयार किया है। अध्ययन में जनगणना आंकड़ों, राज्य प्रवासन आयोग की रिपोर्टों और अल्मोड़ा व नैनीताल जिलों के गांवों में किए गए फील्ड इंटरव्यू का विश्लेषण किया गया।
अध्ययन के अनुसार, पहाड़ों से पलायन के कारण अब केवल रोजगार तक सीमित नहीं हैं। कृषि संकट, जल स्रोतों का सूखना, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, कमजोर शिक्षा व्यवस्था और स्थानीय स्तर पर बुनियादी ढांचे की कमी भी लोगों को गांव छोड़ने के लिए मजबूर कर रही है।
नैनीताल निवासी और IIT मद्रास में पीएचडी कर रहे आयुष शाह ने बताया कि अध्ययन उत्तराखंड के पहाड़ी और मैदानी क्षेत्रों के बीच बढ़ती विकासात्मक खाई को उजागर करता है। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध होने के बावजूद पहाड़ी जिलों में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और अन्य बुनियादी सेवाओं का विस्तार अपेक्षित गति से नहीं हो पाया है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, जलवायु परिवर्तन ने पहले से मौजूद पलायन की समस्या को और गंभीर बना दिया है। अनियमित वर्षा, जल उपलब्धता में कमी, जलवायु जनित आपदाओं की बढ़ती घटनाएं और कृषि उत्पादकता में गिरावट ने पारंपरिक आजीविका को प्रभावित किया है। छोटे किसानों और पशुपालन पर निर्भर परिवार बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और स्थिर आय की तलाश में मैदानी क्षेत्रों का रुख कर रहे हैं।
अध्ययन में शामिल लोगों से बातचीत के आधार पर शोधकर्ताओं ने पाया कि अधिकांश मामलों में पलायन स्वैच्छिक नहीं बल्कि मजबूरी का फैसला है। लोगों ने घटती कृषि उपज, सूखते जल स्रोतों और रोजगार के सीमित अवसरों को गांव छोड़ने की प्रमुख वजह बताया।
रिपोर्ट के अनुसार, इसका जनसांख्यिकीय प्रभाव भी साफ दिखाई देने लगा है। बड़ी संख्या में युवा और कामकाजी उम्र के लोग गांव छोड़ चुके हैं, जबकि बुजुर्ग आबादी गांवों में रह गई है। बंद पड़े मकान, परती पड़ी सीढ़ीदार खेती और घटती आबादी अब अलग-अलग घटनाएं नहीं बल्कि व्यापक सामाजिक बदलाव का संकेत हैं, जो उत्तराखंड के हिमालयी समाज की सांस्कृतिक और आर्थिक संरचना के लिए चुनौती बन रहे हैं।
राज्य प्रवासन आयोग के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2011 से 2022 के बीच उत्तराखंड के गांवों से 6.9 लाख से अधिक लोगों ने अस्थायी पलायन किया, जबकि करीब 1.4 लाख लोग स्थायी रूप से गांव छोड़ गए। अल्मोड़ा, टिहरी और पौड़ी सबसे अधिक प्रभावित जिलों में शामिल हैं। वहीं 2018 के बाद 24 और गांव पूरी तरह आबादीविहीन हो गए, जिससे 2011 से 2018 के बीच खाली हुए 734 गांवों की संख्या और बढ़ गई।
प्रोफेसर कृष्णा मलाकर ने कहा कि यह प्रवृत्ति न केवल पहाड़ों बल्कि मैदानी क्षेत्रों के लिए भी चिंता का विषय है। उनके अनुसार, जब गांव खाली होते हैं और शहरों में पर्याप्त रोजगार, आवास तथा सेवाओं के बिना आबादी बढ़ती है, तो समस्या एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में स्थानांतरित हो जाती है।
अध्ययन में जलवायु-अनुकूल कृषि, बेहतर सड़क संपर्क, विश्वसनीय स्वास्थ्य सेवाएं, मजबूत शिक्षा व्यवस्था और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप रोजगार सृजन पर तत्काल नीति-स्तरीय हस्तक्षेप की आवश्यकता बताई गई है। साथ ही कहा गया है कि बागवानी, पशुपालन, इको-टूरिज्म, खाद्य प्रसंस्करण और छोटे उद्यमों को बढ़ावा दिए बिना रिवर्स माइग्रेशन की संभावनाएं सीमित रहेंगी।
शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो उत्तराखंड केवल अपनी पहाड़ी आबादी ही नहीं, बल्कि सदियों पुरानी ग्राम्य व्यवस्था, पारंपरिक ज्ञान, सांस्कृतिक विरासत और पर्वतीय आजीविकाओं को भी खो सकता है।


