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हिमांश (HIMANSH): हिमालय की गोद में बसा भारत का अद्भुत उच्च-ऊंचाई अनुसंधान केंद्र

हिमालय, जिसे हम पृथ्वी का तीसरा ध्रुव कहते हैं, न सिर्फ़ आस्था और प्राकृतिक सौंदर्य का केंद्र है, बल्कि दुनिया भर के वैज्ञानिकों के लिए एक जीवंत प्रयोगशाला भी है। इसी की गोद में, समुद्र तल से लगभग 13,500 फुट (4,100 मीटर) की ऊंचाई पर, स्थित है भारत का एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अड्डा – हिमांश (HIMANSH)। यह नाम दो शब्दों – ‘हिम’ (बर्फ) और ‘अंश’ (भाग) से मिलकर बना है, जो इसके मुख्य उद्देश्य को पूरी तरह से परिभाषित करता है।

हिमांश (HIMANSH) क्या है?

हिमांश भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय (Ministry of Science and Technology) के तहत काम करने वाले राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं समुद्री अनुसंधान केंद्र (National Centre for Polar and Ocean Research – NCPOR) की एक उच्च-ऊंचाई अनुसंधान सुविधा है। इसकी स्थापना 2016 में चंद्र नदी घाटी, स्पीति (हिमाचल प्रदेश) में की गई थी। यह स्टेशन विशेष रूप से हिमालयी ग्लेशियरों (हिमनदों) और उनके आसपास के पर्यावरण पर गहन शोध के लिए समर्पित है।

हिमांश की स्थापना का उद्देश्य

हिमालय के ग्लेशियर एशिया की जलापूर्ति का एक प्रमुख स्रोत हैं, जिन्हें अक्सर ‘एशिया के वाटर टावर’ कहा जाता है। इन ग्लेशियरों के पिघलने की दर, जलवायु परिवर्तन का प्रभाव और भविष्य में पानी की उपलब्धता का अनुमान लगाने के लिए लगातार निगरानी और अध्ययन की आवश्यकता है। हिमांश की स्थापना का मुख्य उद्देश्य यही है:

  • ग्लेशियरों का अध्ययन: हिमालयी ग्लेशियरों के द्रव्यमान, प्रवाह, पिघलने की दर और उन पर जमा हुए धूल और कार्बन के कणों (ब्लैक कार्बन) के प्रभाव का विस्तृत अध्ययन करना।
  • जलवायु परिवर्तन पर नज़र: हिमालय क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के प्रत्यक्ष प्रभावों को रिकॉर्ड करना और उसके मॉडल तैयार करना।
  • हाइड्रोलॉजिकल शोध: ग्लेशियरों के पिघलने से नदियों में आने वाले पानी की मात्रा और मौसमी बदलावों का अध्ययन करना।
  • डेटा का केंद्र: इस क्षेत्र से संबंधित दुर्लभ और महत्वपूर्ण वैज्ञानिक डेटा एकत्र करना, जिसका उपयोग भविष्य की नीतियों और शोधों में किया जा सके।

हिमांश से जुड़े प्रमुख शोध और उपकरण

हिमांश एक स्थिर प्रयोगशाला से कहीं आगे का केंद्र है। यहाँ के वैज्ञानिक फील्ड में जाकर सीधे शोध कार्य करते हैं। इनमें शामिल हैं:

  • ग्लेशियर मॉनिटरिंग: सेंटीनेल और लैंडसैट जैसे उपग्रह डेटा का उपयोग करके ग्लेशियरों की स्थिति पर नजर रखना।
  • अभियान और सैंपलिंग: वैज्ञानिक ग्लेशियरों पर चढ़ाई करके बर्फ के कोर (सैंपल) एकत्र करते हैं, जिनका विश्लेषण करके सैकड़ों साल पुराने जलवायु रिकॉर्ड का पता लगाया जा सकता है।
  • ऑटोमेटिक वेदर स्टेशन (AWS): ये स्टेशन लगातार तापमान, आर्द्रता, हवा की गति, वर्षा और सोलर रेडिएशन का डेटा रिकॉर्ड करते हैं।
  • ग्राउंड-पेनेट्रेटिंग रडार (GPR): इस उपकरण की मदद से ग्लेशियरों की मोटाई और उनके नीचे की ज़मीनी सतह का पता लगाया जाता है।
  • हाइड्रोलॉजिकल सेंसर: नदियों और नालों में पानी के प्रवाह और स्तर को मापने के लिए सेंसर लगाए जाते हैं।

हिमांश का महत्व और भविष्य

हिमांश सिर्फ एक शोध केंद्र नहीं, बल्कि भारत की वैज्ञानिक सूझबूझ का एक प्रतीक है। इसके महत्व को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:

  • रणनीतिक महत्व: यह स्टेशन एक ऐसे क्षेत्र में स्थित है जो भारत के लिए रणनीतिक और पर्यावरणीय, दोनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
  • जल सुरक्षा: गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र जैसी प्रमुख नदियों के जल स्रोतों के बारे में समझ विकसित करके, यह केंद्र देश की जल सुरक्षा में अहम भूमिका निभा रहा है।
  • आपदा प्रबंधन: ग्लेशियर झील के फटने (GLOF) जैसी प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम का आकलन करने में यहाँ का शोध मददगार साबित होता है।
  • अंतर्राष्ट्रीय सहयोग: हिमांश पर किया गया शोध अंतर्राष्ट्रीय जलवायु विज्ञान और ग्लेशियोलॉजी समुदाय के लिए भी मूल्यवान डेटा प्रदान करता है।

हिमांश (HIMANSH) भारत की वैज्ञानिक उत्कृष्टता और पर्यावरण के प्रति प्रतिबद्धता की एक जीवंत मिसाल है। हिमालय की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बीच काम करते हुए, यहाँ के वैज्ञानिक भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और स्थिर पर्यावरण सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में, हिमांश जैसे केंद्रों से प्राप्त होने वाला ज्ञान और डेटा न सिर्फ भारत, बल्कि पूरी मानवता के लिए एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाएगा। यह हिमालय की चुप्पी को तोड़कर जलवायु के बदलावों की कहानी बयां कर रहा है, और हमारा यह कर्तव्य है कि हम इसकी आवाज़ सुनें।


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