(Kafal Tree Live Uttarakhand News) 5 अगस्त की वो काली रात… जब धराली गाँव के ऊपर आसमान फट पड़ा। बादलों ने इतना पानी बरसाया कि खीरगंगा नदी उफन आई। पल भर में सब कुछ बह गया। सड़कें, पुल, घर… सब कुछ तबाह। गंगोत्री हाईवे के कई हिस्से मलबे के ढेर में तब्दील हो गए। आज भी, हफ्तों बाद, इस इलाके से गुजरने वाले वाहन अस्थायी और डगमगाते रास्तों से गुजरने को मजबूर हैं। यह नज़ारा इतना डरावना था कि इसने सरकार की नींद हराम कर दी।
क्या है पूरा मामला?
गंगोत्री नेशनल हाईवे को उत्तरकाशी से भैरोंघाटी तक चौड़ा करने का प्रस्ताव 2015 से ही लंबित पड़ा था। यह इलाका अपनी प्राकृतिक संवेदनशीलता के लिए कुख्यात है। भूस्खलन, बाढ़ और भूकंप यहाँ आम बात हैं। ऐसे में, सड़क चौड़ीकरण का काम एक बेहद नाजुक चुनौती है। अगस्त की तबाही के बाद, सीमा सड़क संगठन (BRO) ने इस पूरे प्रोजेक्ट को फिर से देखने का फैसला किया है।
पांच हिस्सों में बंटा है हाईवे विस्तार का प्रोजेक्ट
इस महत्वाकांक्षी परियोजना को पाँच हिस्सों में बाँटा गया था:
- चंगी बदेथी से टेकला
- टेकला से हीना बाईपास
- हीना से सुक्की
- सुक्की बाईपास
- झाला से भैरोंघाटी
BRO के अधिकारियों के मुताबिक, बाढ़ में हुई भारी तबाही के तुरंत बाद ही इस समीक्षा प्रक्रिया को शुरू कर दिया गया था। अब विशेषज्ञों की एक टीम इस बात की जाँच करेगी कि इस भू-वैज्ञानिक रूप से संवेदनशील इलाके में काम कैसे किया जाए। (Kafal Tree Live Uttarakhand News)
तीन हिस्सों पर हो रही है खास नजर
BRO के कमांडर राज किशोर ने बताया कि केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय अपनी समीक्षा में तीन खास हिस्सों पर फोकस कर रहा है:
- भैरोंघाटी से झाला
- हीना से टेकला
- टेकला से चंगी बदेथी
कमांडर राज किशोर का कहना है कि स्पष्ट है, “समीक्षा पूरी होने के बाद ही सड़क चौड़ीकरण का काम आगे बढ़ेगा।” यह बयान इस बात का संकेत है कि सरकार इस बार कोई जोखिम नहीं लेना चाहती।
प्रशासन ने क्या कहा?
उत्तरकाशी के जिलाधिकारी प्रशांत आर्य ने इस पूरी स्थिति पर प्रकाश डालते हुए कहा, “गंगोत्री हाईवे पर चौड़ीकरण और बाईपास के लिए पाँच पैच प्रस्तावित हैं, जिनमें से तीन पैच पर समीक्षा की जा रही है। इस समीक्षा में खतरनाक जोन और पेड़ों की कम कटाई पर ध्यान दिया जा रहा है। जल्द ही रिपोर्ट भेजकर काम शुरू कर दिया जाएगा।”
विकास बनाम पर्यावरण की सदियों पुरानी लड़ाई
गंगोत्री हाईवे का यह सवाल सिर्फ एक सड़क का मामला नहीं रह गया है। यह विकास और पर्यावरण के बीच की उस सदियों पुरानी लड़ाई का एक नया अध्याय है। एक तरफ लाखों तीर्थयात्रियों की सुविधा और सुरक्षा है, तो दूसरी तरफ हिमालय की नाजुक पारिस्थितिकी है। अगस्त की बाढ़ ने एक बार फिर यह चेतावनी दी है कि प्रकृति से छेड़छाड़ की कीमत बहुत भारी हो सकती है। अब देखना यह है कि केंद्र सरकार की यह समीक्षा एक सुरक्षित और टिकाऊ समाधान ला पाती है या नहीं। क्या इस बार इंसान प्रकृति के आगे सीख लेगा, या फिर विकास की अंधी दौड़ में एक और हादसा होने का इंतज़ार करेगा? (Kafal Tree Live Uttarakhand News)


