हल्द्वानी, 1 जुलाई 2026। उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय, हल्द्वानी में बुधवार को देश की ऊर्जा सुरक्षा और भविष्य की चुनौतियों पर एक महत्वपूर्ण व्याख्यान आयोजित किया गया। इस अवसर पर प्रख्यात वैज्ञानिक, पूर्व डीआरडीओ प्रमुख एवं नीति आयोग से लंबे समय तक जुड़े रहे डॉ. वी.के. सारस्वत मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने “करेंट एनर्जी सिनेरियो/फ्यूचर ऑफ इंडिया: रिक्वायरमेंट्स एंड स्टेप फॉरवर्ड” विषय पर विस्तृत प्रस्तुति दी, जिसमें भारत की वर्तमान ऊर्जा स्थिति, आयात निर्भरता, स्वच्छ ऊर्जा में हो रहे बदलाव और आने वाले वर्षों की रणनीति पर प्रकाश डाला गया।
व्याख्यान की शुरुआत करते हुए डॉ. सारस्वत ने भारत की ऊर्जा जरूरतों की तस्वीर पेश की। उन्होंने बताया कि लगभग 0.95 के मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) को हासिल करने के लिए देश को प्रतिवर्ष 28,000 टेरावाट-घंटा (TWh) से अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होगी। उन्होंने कहा कि अगस्त 2025 में भारत ने गैर-जीवाश्म ऊर्जा की स्थापित क्षमता में 250 गीगावाट का आंकड़ा पार कर लिया था और नवंबर 2025 तक यह क्षमता बढ़कर 262.74 गीगावाट यानी कुल क्षमता की 51.5 प्रतिशत हो गई। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि थर्मल पावर अब भी 48.45 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ प्रमुख भूमिका में बना हुआ है।
आयात निर्भरता को देश की सबसे बड़ी कमजोरी बताते हुए डॉ. सारस्वत ने कहा कि भारत अपनी 87 प्रतिशत कच्चे तेल की जरूरत आयात से पूरी करता है, जबकि रणनीतिक भंडार मात्र 9 दिनों की खपत के बराबर है। उन्होंने बताया कि 2022 के बाद रूस से आयात में तेज बढ़ोतरी हुई है और अब रूस भारत के कुल कच्चे तेल आयात का 38 प्रतिशत हिस्सा उपलब्ध कराता है, जबकि पहले यह हिस्सा 2 प्रतिशत से भी कम था। इसके साथ ही सरकार रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को विशाखापत्तनम, पादुर और मंगलौर में 5.3 मिलियन मीट्रिक टन से बढ़ाकर 15 मिलियन मीट्रिक टन करने की दिशा में काम कर रही है। लीथियम, कोबाल्ट और निकल जैसे क्रिटिकल मिनरल्स के लिए भारत की निर्भरता ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना और चिली जैसे देशों पर है।
प्रति व्यक्ति ऊर्जा खपत के आंकड़े प्रस्तुत करते हुए उन्होंने बताया कि भारत की खपत अमेरिका की तुलना में लगभग दसवां हिस्सा और वैश्विक औसत की आधी है। उन्होंने कहा कि 2047 तक विकसित देश का दर्जा हासिल करने के लिए प्रति व्यक्ति बिजली खपत 3,000 से 4,000 किलोवाट-घंटा तक पहुंचानी होगी। इसके साथ ही उन्होंने ऊर्जा गरीबी की स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के 2024 के आंकड़ों के अनुसार अब भी लगभग 7 करोड़ परिवार खाना पकाने के लिए बायोमास पर निर्भर हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में औसतन 8 से 10 घंटे बिजली आपूर्ति मिलती है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 22 घंटे से अधिक है।
डॉ. सारस्वत ने बताया कि पिछले तीन दशकों में देश की ऊर्जा मांग तीन गुना बढ़ चुकी है और यह रुझान आगे भी जारी रहेगा। उनके अनुसार 2047 तक सामान्य परिदृश्य में बिजली की मांग लगभग 6,000 टेरावाट-घंटा तक पहुंच सकती है, जबकि 2070 तक कुल ऊर्जा मांग 18,900 से 22,300 टेरावाट-घंटा प्रतिवर्ष के बीच रहने का अनुमान है। उन्होंने शहरीकरण, औद्योगीकरण, इलेक्ट्रिक वाहन, कूलिंग की बढ़ती मांग, डिजिटल अर्थव्यवस्था और कृषि क्षेत्र को ऊर्जा मांग बढ़ाने वाले प्रमुख कारकों के रूप में गिनाया। उन्होंने कहा कि 2047 तक शहरी आबादी 50 करोड़ से बढ़कर 90 करोड़ हो जाने की संभावना है और 2050 तक देश में करीब 1 अरब एयर कंडीशनर हो सकते हैं।
कोयले की भूमिका पर बोलते हुए डॉ. सारस्वत ने बताया कि भारत के पास अनुमानित तौर पर लगभग 400 अरब टन कोयला भंडार है, जिसमें से लगभग 220 अरब टन को ‘सिद्ध’ श्रेणी में रखा गया है। वित्त वर्ष 2024-25 में देश ने 1.047 अरब टन कोयला उत्पादन का ऐतिहासिक आंकड़ा हासिल किया और 2030 तक 1.5 अरब टन उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने बताया कि कोयला आयात में वित्त वर्ष 2025 में 8.4 प्रतिशत की कमी आई, जिससे लगभग 5.43 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा की बचत हुई। स्वच्छ कोयला तकनीकों जैसे IGCC, A-USC और IGFC के माध्यम से बिजली उत्पादन दक्षता बढ़ाने और कार्बन उत्सर्जन घटाने पर भी शोध जारी है।
सौर ऊर्जा को भारत की सबसे बड़ी संभावना बताते हुए उन्होंने कहा कि मार्च 2025 में देश ने 100 गीगावाट सौर स्थापित क्षमता का आंकड़ा पार किया, जो पिछले 10 वर्षों में 25 गुना वृद्धि दर्शाता है। उन्होंने बताया कि 2023 में भारत में अब तक की सबसे कम सौर टैरिफ दर 2.20 रुपये प्रति किलोवाट-घंटा दर्ज की गई। 2030 तक 500 गीगावाट अक्षय ऊर्जा क्षमता के लक्ष्य में से 300 गीगावाट सौर ऊर्जा से हासिल करने की योजना है। पीएम कुसुम योजना के तहत किसानों के लिए एक करोड़ सोलर पंप और पीएम सूर्य घर योजना के तहत एक करोड़ घरों में रूफटॉप सोलर लगाने के लक्ष्य पर भी चर्चा हुई। उन्होंने बताया कि सौर स्थापित क्षमता के मामले में भारत अब विश्व में चौथे स्थान पर है।
पवन ऊर्जा के संदर्भ में उन्होंने बताया कि भारत की स्थापित क्षमता 48 गीगावाट है, जो वैश्विक स्तर पर चौथी सबसे बड़ी है, जबकि आकलित पवन क्षमता 695 गीगावाट है। तमिलनाडु, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र और कर्नाटक मिलकर देश की कुल स्थापित क्षमता का 85 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं। उन्होंने बताया कि भारत की 7,600 किलोमीटर लंबी तटरेखा में 300 गीगावाट से अधिक अपतटीय पवन ऊर्जा की संभावना है और 2024 में पहली अपतटीय निविदा जारी की गई थी।
जलविद्युत को स्थिर और स्वच्छ ऊर्जा का प्रमुख स्रोत बताते हुए डॉ. सारस्वत ने कहा कि देश में 47 गीगावाट बड़ी और 5 गीगावाट छोटी जलविद्युत क्षमता स्थापित है, जबकि 150 गीगावाट क्षमता अब भी अप्रयुक्त है, जो मुख्यतः पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों में स्थित है। उन्होंने तीस्ता-VI, दिबांग और पंचेश्वर जैसी परियोजनाओं का उल्लेख किया, जो निर्माणाधीन हैं। पंचेश्वर परियोजना का सीधा संबंध उत्तराखंड से है, जिसे लेकर श्रोताओं में विशेष रुचि देखी गई।
परमाणु ऊर्जा पर विस्तार से बोलते हुए उन्होंने भारत के तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम की जानकारी दी, जिसमें पहले चरण में दाबित भारी जल रिएक्टर (पीएचडब्ल्यूआर), दूसरे चरण में फास्ट ब्रीडर रिएक्टर और तीसरे चरण में थोरियम आधारित रिएक्टर शामिल हैं। उन्होंने बताया कि देश फिलहाल दूसरे चरण में है। 2025 में परमाणु ऊर्जा की स्थापित क्षमता में 71 प्रतिशत की वृद्धि होकर यह 8,780 मेगावाट तक पहुंच गई है, जो 25 परमाणु रिएक्टरों से प्राप्त होती है। सरकार ने 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु क्षमता का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। उन्होंने स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (एसएमआर) तकनीक की भी चर्चा की, जिसमें केंद्र सरकार ने बजट 2025-26 में शोध एवं विकास के लिए 20,000 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं। इसके साथ ही परमाणु ऊर्जा से जुड़े कानूनों में संशोधन कर निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में भी कदम उठाए जा रहे हैं।
हाइड्रोजन को भविष्य का महत्वपूर्ण स्वच्छ ऊर्जा वाहक बताते हुए उन्होंने कहा कि 2030 तक 50 लाख मीट्रिक टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन के लक्ष्य के लिए 211.4 गीगावाट सौर क्षमता की आवश्यकता होगी, जबकि जनवरी 2026 तक स्थापित सौर क्षमता 140.6 गीगावाट है। इसके लिए 1.41 से 1.91 लाख हेक्टेयर भूमि और प्रतिवर्ष 160 अरब लीटर पानी की जरूरत होगी। मेथनॉल और जैव ईंधन को भी वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत के रूप में प्रस्तुत करते हुए उन्होंने बताया कि 2024 में भारत में 6.25 अरब लीटर एथेनॉल का उत्पादन हुआ तथा 15 प्रतिशत ब्लेंडिंग दर हासिल की गई, जिससे लगभग 99,014 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा की बचत हुई।
क्रिटिकल मिनरल्स को ऊर्जा सुरक्षा का छिपा हुआ पहलू बताते हुए उन्होंने आगाह किया कि लीथियम, कोबाल्ट और ग्रेफाइट जैसे खनिजों की मांग 2050 तक 2020 के उत्पादन स्तर के मुकाबले कई गुना बढ़ने वाली है। वैश्विक तुलना प्रस्तुत करते हुए उन्होंने कहा कि नवीकरणीय ऊर्जा हिस्सेदारी के मामले में भारत (27 प्रतिशत) अब भी चीन (35 प्रतिशत) और जर्मनी (65 प्रतिशत) से पीछे है, और स्वच्छ ऊर्जा निवेश में भी भारत का 80 अरब डॉलर चीन के 680 अरब डॉलर की तुलना में काफी कम है।
व्याख्यान के अंतिम भाग में डॉ. सारस्वत ने देश के सामने मौजूद प्रमुख चुनौतियों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि 500 गीगावाट परिवर्तनशील नवीकरणीय ऊर्जा को ग्रिड में समाहित करने के लिए 400 गीगावाट-घंटा से अधिक बैटरी भंडारण क्षमता चाहिए, जबकि वर्तमान क्षमता मात्र 4 गीगावाट है। उन्होंने आपूर्ति श्रृंखला में चीन पर निर्भरता, जलवायु संवेदनशीलता, वित्तपोषण की कमी और कुशल कार्यबल की जरूरत को भी बड़ी चुनौतियों के रूप में गिनाया। उनके अनुसार 2030 तक ऊर्जा परिवर्तन के लिए लगभग 500 अरब डॉलर के निवेश की आवश्यकता है, जबकि वर्तमान वार्षिक निवेश केवल 70 से 80 अरब डॉलर है। इसी तरह 2030 तक 3.5 से 5 करोड़ कुशल ऊर्जा कर्मियों की जरूरत होगी, जबकि वर्तमान में यह संख्या मात्र 8.5 लाख है।
उन्होंने राष्ट्रीय सौर मिशन, ग्रीन हाइड्रोजन मिशन, पीएम सूर्य घर योजना, पीएम कुसुम, फेम-2 और राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति जैसी सरकारी योजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इन सबका उद्देश्य देश को ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना है। इसके साथ ही उन्होंने अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (आईएसए), आपदा प्रतिरोधी अवसंरचना गठबंधन (सीडीआरआई), वन सन वन वर्ल्ड वन ग्रिड और भारत-अमेरिका iCET जैसी वैश्विक साझेदारियों की भी जानकारी दी।
व्याख्यान का समापन करते हुए डॉ. सारस्वत ने कहा कि भारत का ऊर्जा परिवर्तन एक चुनौती के साथ-साथ एक बड़ा अवसर भी है। उन्होंने कहा कि सौर पैनल, बैटरी और इलेक्ट्रोलाइजर जैसे उपकरणों के घरेलू विनिर्माण से न केवल आयात पर निर्भरता घटेगी बल्कि रोजगार सृजन में भी मदद मिलेगी। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सरकार, निजी क्षेत्र और अंतरराष्ट्रीय भागीदारी के समन्वित प्रयासों से ही यह लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
कार्यक्रम में उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के अधिकारियों, शिक्षकों तथा विद्यार्थियों सहित बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे और व्याख्यान के उपरांत उपस्थित श्रोताओं ने विषय से जुड़े कई प्रश्न भी पूछे।
कार्यक्रम के अंत में उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नवीन चंद्र लोहनी ने डॉ. सारस्वत का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के कार्यक्रम विश्वविद्यालय परिवार तथा समस्त श्रोताओं के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध होते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि विश्वविद्यालय ऐसे ज्ञानवर्धक आयोजनों के लिए हर आवश्यक सहयोग हेतु सदैव तत्पर रहेगा।
विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो. पी.डी. पंत ने सभी उपस्थित अतिथियों, शिक्षकों तथा विद्यार्थियों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने विशेष रूप से कार्यक्रम की आयोजक प्रो. गिरिजा पांडे को इस सफल आयोजन के लिए धन्यवाद दिया।
उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय पहुंचे प्रधानमंत्री की तकनीकी सलाहकार समिति के सदस्य डॉ. वी.के. सारस्वत, ऊर्जा सुरक्षा पर दिया विशेष व्याख्यान


