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फ़िल्म ‘आदमी और इंसान’: उत्तराखंड की वादियों में रची-बसी धर्मेन्द्र की एक यादगार फ़िल्म

धर्मेन्द्र की मृत्यु की खबर ने आज पूरे देश को शोक में डाल दिया है। उनके लंबे और बहुरंगी करियर में अनेक फ़िल्में ऐसी हैं जो आज भी दर्शकों के मन में बसी हुई हैं। इन्हीं में से एक है 1969 की फ़िल्म ‘आदमी और इंसान’, जो न केवल अभिनय, कहानी और संगीत के कारण महत्वपूर्ण है, बल्कि इसलिए भी याद रखी जाती है कि इसका बड़ा हिस्सा उत्तराखंड की प्राकृतिक लोकेशनों—विशेष रूप से नैनीताल, भीमताल और काठगोदाम—में फिल्माया गया था। आज के संदर्भ में यह फ़िल्म उत्तराखंड की शुरुआती सिनेमाई उपस्थिति का एक अहम अध्याय भी बन जाती है।

यश चोपड़ा अपने समय में लोकेशन और दृश्य-संयोजन के लिए खास पहचान रखते थे। उन्होंने इस फ़िल्म के लिए उत्तराखंड की उस नैसर्गिक सुंदरता को चुना जो उस समय कैमरे पर बहुत कम दिखाई देती थी। भीमताल झील के किनारे फैली शांति, नैनीताल की ढलानों से दिखते विस्तृत दृश्य, और काठगोदाम—नैनीताल मार्ग की पहाड़ी सड़कों की संकरी मोड़दार बनावट—इन सबने फिल्म को एक अनोखी दृश्य-गहराई प्रदान की। 1960 के दशक में इन स्थानों पर शूट करना आसान नहीं था; उपकरणों की सीमाएँ थीं, परिवहन कठिन था, और पर्वतीय इलाकों में मौसम कभी भी बदल सकता था। इसके बावजूद यश चोपड़ा ने जोखिम लिया और वह जोखिम अंततः फ़िल्म की सौंदर्य-भाषा को समृद्ध करने वाला साबित हुआ। उत्तराखंड की पृष्ठभूमि न सिर्फ दृश्यों को सुंदर बनाती है, बल्कि कहानी के भावनात्मक घनत्व को भी उभारती है।

फ़िल्म की कथा दो मित्रों—धर्मेन्द्र और फिरोज़ खान—के इर्द-गिर्द घूमती है। धर्मेन्द्र का किरदार एक ईमानदार, मेहनती और सादगीपूर्ण व्यक्ति का है, जिसकी दुनिया विश्वास और सिद्धांतों पर टिकी है। दूसरी ओर फिरोज़ खान एक महत्वाकांक्षी और आकर्षक व्यक्तित्व हैं, जो सफलता के लिए जोखिम उठाने से नहीं हिचकते। दोनों एक-दूसरे के लिए सम्मान और भरोसे से भरे हुए हैं, लेकिन परिस्थितियाँ उन्हें एक ऐसे मोड़ पर ले आती हैं जहाँ दोस्ती, प्रेम और नैतिकता तीनों एक-दूसरे से टकराते हैं। इन दोनों के बीच आती है प्रेमिका—मुमताज़—जो कहानी में भावनात्मक जटिलता को और बढ़ाती है। उद्योगिक राजनीति, गलतफहमियों और बाहरी दखल के कारण दोनों मित्र एक-दूसरे के खिलाफ खड़े दिखाई देते हैं। कहानी अंततः यह रेखांकित करते हुए समाप्त होती है कि आदमी होना और इंसान होना दो अलग बातें हैं—और इंसान वही है जो सच्चाई, ईमानदारी और रिश्तों को अंतिम महत्व देता है।

उत्तराखंड की वादियों में फिल्माए गए कई दृश्य इस आंतरिक संघर्ष को अभिव्यक्त करते हुए दिखाई देते हैं। भीमताल की शांत झील के किनारे खड़ी मुमताज़, नैनीताल की ढलानों पर विचारों में डूबे धर्मेन्द्र, या पहाड़ी रास्तों पर दौड़ते वाहन—ये दृश्य पात्रों की भावनाओं के विस्तार जैसे लगते हैं। उत्तराखंड का वातावरण जिस तरह कहानी के मूड के साथ घुल-मिल जाता है, वह इस फ़िल्म की विशेष उपलब्धि है। यह कहना गलत नहीं होगा कि यदि स्थान बदल दिए जाते, तो फिल्म का प्रभाव भी काफी बदल जाता।

‘आदमी और इंसान’ उस दौर की उन चुनिंदा फिल्मों में शामिल है जिसने उत्तराखंड को हिंदी फिल्म उद्योग की नज़र में लाया। आगे के वर्षों में यश चोपड़ा और अन्य फिल्मकारों ने जिस तरह इस क्षेत्र में शूटिंग की परंपरा को बढ़ाया, उसकी शुरुआती पगडंडी इसी फिल्म ने तैयार की थी। धर्मेन्द्र के शांत, गंभीर और मानवीय अभिनय को इन प्राकृतिक पृष्ठभूमियों ने और अधिक प्रभावी बनाया, जिससे यह फिल्म उनके शुरुआती करियर का एक चमकता अध्याय बन गई।

आज धर्मेन्द्र को याद करते हुए ‘आदमी और इंसान’ सिर्फ एक फ़िल्म नहीं, बल्कि उनकी स्मृति में दर्ज एक महत्वपूर्ण दृश्य-पृष्ठ भी बन जाती है—जहाँ उनका अभिनय, यश चोपड़ा की दृष्टि और उत्तराखंड की वादियों का सौंदर्य एक साथ मिलकर एक ऐसा अनुभव रचते हैं जिसकी चमक आज भी कायम है।

काफल ट्री डेस्क