हालांकि सांख्यिकी में नोबेल नहीं मिलता है. लेकिन भारतीय-अमेरिकी सांख्यिकीविद् कैल्याम्पुडी राधाकृष्ण राव (सीआर राव) को 2023 में सांख्यिकी के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार के समकक्ष माने जाने वाले अंतर्राष्ट्रीय सांख्यिकी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। आज उनकी कहानी जानते हैं.
यह कहानी है एक ऐसे व्यक्ति की जिसने आंकड़ों (Data) की दुनिया को एक नई भाषा और नई दिशा दी। 102 साल की उम्र में जब अधिकांश लोग आराम की जिंदगी जी रहे होते हैं, प्रोफेसर सी.आर. राव ने एक और ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की। उन्हें ‘2023 इंटरनेशनल प्राइज इन स्टैटिस्टिक्स’ (International Prize in Statistics) से नवाजा गया, जिसे सांख्यिकी का नोबेल पुरस्कार माना जाता है। यह पुरस्कार उनके 1945 में प्रकाशित एक शोध पत्र में दिए गए तीन सिद्धांतों के लिए दिया गया, जो आज डेटा साइंस और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence) की नींव बने हुए हैं।
भारत में जन्म, शिक्षा और युवावस्था की ग्राउंडब्रेकिंग रिसर्च
कैल्याम्पुडी राधाकृष्ण राव का जन्म 10 सितंबर, 1920 को कर्नाटक के हदगली गाँव में एक तेलुगु परिवार में हुआ था। उनकी शुरुआती पढ़ाई भारत में ही हुई। उन्होंने आंध्र विश्वविद्यालय से गणित में स्नातक किया और उसके बाद कलकत्ता विश्वविद्यालय (University of Calcutta) से सांख्यिकी में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की।
यह वह दौर था जब भारत में सांख्यिकी एक नया विषय था। प्रोफेसर पी. सी. महालनोबिस (P.C. Mahalanobis) ने इस क्षेत्र में क्रांति ला दी थी और महज 20-22 साल की उम्र में राव उनके सानिध्य में भारतीय सांख्यिकी संस्थान (Indian Statistical Institute) से जुड़े। यहीं रहकर, केवल 25 साल की उम्र में, उन्होंने वह ऐतिहासिक शोध पत्र लिखा, जिसने दुनिया बदल दी। इस पत्र में उन्होंने तीन मौलिक सिद्धांत दिए:
- क्रैमर-राव बाउंड (Cramer-Rao Bound): यह बताता है कि किसी अनुमान (Estimate) की सटीकता की एक सैद्धांतिक सीमा क्या होती है। यह डेटा एनालिसिस (Data Analysis) की रीढ़ की हड्डी है।
- राव-ब्लैकवेल प्रमेय (Rao-Blackwell Theorem): यह सिद्धांत बताता है कि कैसे एक साधारण अनुमानक को और अधिक सटीक और बेहतर बनाया जा सकता है।
- सूचना ज्यामिति (Information Geometry) की नींव: उन्होंने सांख्यिकी और ज्यामिति के बीच एक गहरा संबंध स्थापित किया, जो आज मशीन लर्निंग (Machine Learning) में बहुत महत्वपूर्ण है।
भारत से अमेरिका का सफर: प्रौढ़ावस्था में वैश्विक पहचान की ओर
भारत में अपनी मजबूत नींव बनाने के बाद, राव का रुझान अंतरराष्ट्रीय शोध की ओर हुआ। लगभग 50 साल की उम्र में, 1970 के दशक में, उन्होंने अमेरिका की यात्रा की और पेन्सिलवेनिया विश्वविद्यालय (University of Pennsylvania) में प्रोफेसर के रूप में कार्य करना शुरू किया। भारत से अमेरिका जाने का यह फैसला उनकी कार्यशैली और शोध को एक वैश्विक पहचान दिलाने के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ।
अमेरिका में उन्हें बेहतरीन शोधकर्ताओं और छात्रों के साथ काम करने का मौका मिला। उन्होंने पिट्सबर्ग विश्वविद्यालय (University of Pittsburgh) में सांख्यिकी विभाग की स्थापना की और वहाँ इसके पहले चेयरमैन बने। अमेरिका में रहकर भी उन्होंने भारतीय मूल के छात्रों को हमेशा प्रोत्साहित किया और भारतीय शिक्षा प्रणाली से अपना नाता बनाए रखा।
100 साल से अधिक उम्र में भी जारी हैअकादमिक योगदान
प्रोफेसर राव ने कभी भी औपचारिक रूप से रिटायरमेंट नहीं ली। 90 साल की उम्र के बाद भी वह सक्रिय रूप से शोध कार्य से जुड़े रहे हैं, सेमिनारों में भाग लेते रहे हैं और युवा शोधार्थियों का मार्गदर्शन करते रहे हैं। उन्होंने साबित कर दिया कि उत्साह और बौद्धिक Curiosity की कोई उम्र नहीं होती है।
102 साल की उम्र में मिली शानदार उपलब्धि
2023 में, जब प्रोफेसर राव 102 साल के थे, उनके 78 साल पुराने शोध को दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित सांख्यिकी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह घटना इस बात का जीता-जागता सबूत है कि सच्चा ज्ञान कभी बूढ़ा नहीं होता और उसकी प्रासंगिकता समय के साथ और बढ़ती जाती है। एक व्यक्ति जिसने 25 साल की उम्र में दुनिया को वह ज्ञान दिया, उसे 102 साल की उम्र में उसके लिए सर्वोच्च सम्मान मिला।
उनकी खोजें आज हर जगह मौजूद हैं – चाहे वह आपके स्मार्टफोन में लगी AI तकनीक हो, मौसम का पूर्वानुमान हो, मेडिकल रिसर्च (Medical Research) में दवाइयों का ट्रायल हो, या फिर आर्थिक आंकड़ों का विश्लेषण। उन्होंने न सिर्फ सांख्यिकी, बल्कि अर्थशास्त्र, जीवविज्ञान, जेनेटिक्स और कंप्यूटर विज्ञान जैसे क्षेत्रों को गहराई से प्रभावित किया है।
प्रेरणा का अटूट स्रोत
प्रोफेसर सी.आर. राव की जीवन यात्रा हर युवा वैज्ञानिक, शोधार्थी और भारतीय के लिए एक बहुत बड़ी प्रेरणा है। उनकी कहानी सिखाती है कि देश में पली-बढ़ी प्रतिभा, जब वैश्विक अवसरों से जुड़ती है, तो दुनिया बदलने वाली खोजें कर सकती है। उन्होंने जो सिद्धांत युवावस्था में दिए थे, वे आज 100 साल से अधिक की उम्र में उन्हें अमर बना रहे हैं। यही एक सच्चे विद्वान की पहचान है।
उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि उम्र सिर्फ एक संख्या है और जुनून, लगन और बुद्धिमत्ता की कोई उम्र नहीं होती। 20 की उम्र से लेकर 100 से अधिक की उम्र तक, ज्ञान की खोज में लगे रहने का जज़्बा ही उन्हें विशेष बनाता है। भारत को ऐसे महान सपूत पर गर्व है।


