Homeकुमाऊँबजट 2026-27 से क्यों ठगा महसूस कर रहा है उत्तराखंड?

बजट 2026-27 से क्यों ठगा महसूस कर रहा है उत्तराखंड?

केंद्रीय बजट 2026-27 का कुल आकार ₹53.5 लाख करोड़ रखा गया है। इसमें सड़क, रेल, शहरी ढांचे और औद्योगिक परियोजनाओं पर भारी निवेश का दावा किया गया है। पूंजीगत व्यय को ₹12.2 लाख करोड़ तक बढ़ाया गया है और वित्तीय घाटा 4.3 प्रतिशत GDP तक सीमित रखने का लक्ष्य रखा गया है।

राष्ट्रीय स्तर पर ये आंकड़े मजबूत दिखते हैं, लेकिन उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में बजट को लेकर असंतोष की भावना है। जानकारों का कहना है कि बजट में उत्तराखंड की भौगोलिक, आर्थिक और पर्यावरणीय चुनौतियों को गंभीरता से नहीं लिया गया।

आपदा प्रभावित राज्य, लेकिन कोई विशेष सहायता नहीं

उत्तराखंड बीते कुछ वर्षों से लगातार आपदाओं की मार झेल रहा है। बादल फटना, फ्लैश फ्लड, भूस्खलन, सड़कें टूटना और गांवों का कट जाना अब सामान्य हो गया है। चारधाम मार्ग से लेकर सीमांत गांवों तक बुनियादी ढांचा बार-बार प्रभावित होता है।

इसके बावजूद बजट में उत्तराखंड के लिए न तो कोई अलग आपदा पुनर्वास पैकेज घोषित किया गया और न ही जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए विशेष फंड की घोषणा हुई। लंबे समय से मांग की जा रही हिमालयी आपदा निधि और आपदा-रोधी ढांचे पर अतिरिक्त केंद्रीय सहायता पर बजट में कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं दिखता।

पहाड़ों की खेती संकट में, बजट में राहत नदारद

उत्तराखंड में खेती पहले ही मुश्किल दौर से गुजर रही है। पहाड़ी इलाकों में बीज, खाद, कीटनाशक, मजदूरी और परिवहन की लागत मैदानी इलाकों से कहीं ज्यादा है। मौसम की अनिश्चितता, ओलावृष्टि और असमय बारिश से फसलें बार-बार खराब हो रही हैं।

बजट में कृषि के लिए राष्ट्रीय स्तर पर प्रावधान तो किया गया है, लेकिन उत्तराखंड के लिए कोई अलग पहाड़ी कृषि पैकेज नहीं है। न कर्ज माफी, न MSP की कानूनी गारंटी और न ही पीएम-किसान की राशि में बढ़ोतरी। किसान मानते हैं कि सालाना ₹6,000 की मदद मौजूदा लागत के सामने बहुत कम है। नतीजा यह है कि गांवों में खेती छोड़ने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।

कर्ज, वेतन और पेंशन का दबाव

उत्तराखंड सरकार पर कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है। राज्य के बजट का बड़ा हिस्सा वेतन और पेंशन में चला जाता है, जिससे विकास कार्यों के लिए सीमित संसाधन बचते हैं। उद्योगों की कमी और पर्यावरणीय सीमाओं के कारण राज्य की आय के स्रोत भी सीमित हैं।

इसके बावजूद केंद्रीय बजट में न तो उत्तराखंड के लिए विशेष वित्तीय राहत की घोषणा हुई और न ही कर्ज पुनर्गठन जैसे किसी विकल्प की चर्चा की गई।

बेरोजगारी और पलायन की अनदेखी

उत्तराखंड की सबसे बड़ी समस्याओं में बेरोजगारी और पलायन शामिल हैं। बजट में उद्योग और मैन्युफैक्चरिंग पर जोर है, लेकिन इसका सीधा लाभ पहाड़ी जिलों तक पहुंचता नहीं दिखता।

युवा रोजगार की तलाश में लगातार मैदानी इलाकों और महानगरों की ओर जा रहे हैं। खासकर सीमांत और ऊंचाई वाले गांव तेजी से खाली हो रहे हैं। बजट में इस पलायन को रोकने के लिए किसी ठोस योजना या पहाड़-विशेष रोजगार मॉडल की झलक नहीं मिलती।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं

आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि बजट विकास केंद्रित है, लेकिन क्षेत्रीय असमानताओं को नजरअंदाज करता है। उत्तराखंड जैसे राज्य, जहां आपदा, खेती और रोजगार तीनों मोर्चों पर संकट है, वहां बिना विशेष नीति के स्थिति और बिगड़ सकती है।

केंद्रीय बजट 2026-27 में बड़े राष्ट्रीय लक्ष्य तो दिखाई देते हैं, लेकिन उत्तराखंड के लिए ठोस आश्वासन नहीं। जब तक पहाड़ी राज्यों की अलग जरूरतों को ध्यान में रखकर विशेष वित्तीय और नीतिगत सहयोग नहीं दिया जाता, तब तक पलायन, खेती का संकट और आपदा से जुड़ी समस्याएं और गहराने की आशंका बनी रहेगी।