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उत्तराखंड में 9875 फीट की ऊंचाई पर दिखा बंगाल टाइगर: पहली बार मिली फोटो, DFO ने लगाए थे स्पेशल कैमरे

उत्तराखंड के बागेश्वर जिले से वन्यजीव प्रेमियों और वैज्ञानिकों के लिए एक बड़ी खबर सामने आई है। यहां 9875 फीट की ऊंचाई पर पहली बार बंगाल टाइगर कैमरे में कैद हुआ है। यह इस क्षेत्र में बाघ की अब तक की सबसे अधिक ऊंचाई पर उपस्थिति का प्रमाणित डिजिटल रिकॉर्ड है।
वन विभाग के शोधकर्ताओं का कहना है कि यह खोज हिमालयी क्षेत्रों में बड़े मांसाहारी जीवों के पारिस्थितिक व्यवहार को समझने में बेहद अहम मानी जाएगी।

भारत सरकार की 2022 की टाइगर जनगणना के अनुसार देश में 3,682 बंगाल टाइगर मौजूद हैं, जो विश्व की कुल बाघ आबादी का लगभग 75% है। ऐसे में ऊंचे हिमालयी क्षेत्र में किसी बाघ का दिख जाना विशेषज्ञों के लिए नई दिशा खोलता है।


कैसे मिला यह सबूत

डीएफओ आदित्य रतन ने बताया कि पिछले कई महीनों से स्थानीय लोग ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बंगाल टाइगर दिखने की बात कह रहे थे। लगातार मिल रही सूचनाओं के बाद वन विभाग ने बागेश्वर के पिंडारी, सुंदरढूंगा और कफनी क्षेत्रों में 55 स्पेशल ट्रैप कैमरे लगाए थे, जिनकी मॉनिटरिंग वैज्ञानिक रजत जोशी और उनकी टीम कर रही है।

इन्हीं कैमरों में सुंदरढूंगा घाटी के पास एक वयस्क बंगाल टाइगर साफ दिखाई दिया। तस्वीर में बाघ को ट्री-लाइन के निकट घने उप-अल्पाइन वन क्षेत्र में घूमते हुए देखा गया। इसके साथ ही क्षेत्र से ताजा बाघ के मल और स्थानीय लोगों की रिपोर्ट ने भी इस उपस्थिति की पुष्टि की।


ऊंचाई पर टाइगर की मौजूदगी का क्या मतलब

DFO आदित्य रतन के अनुसार, ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में बाघ का दिखना बड़े मांसाहारी जीवों के बीच पारिस्थितिक ओवरलैप का संकेत है।
यह खोज उत्तराखंड वन विभाग के राष्ट्रीय हरित भारत मिशन (GIM) और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के तहत चल रही हिम तेंदुआ आवास एवं अल्पाइन पारितंत्र सुरक्षा परियोजना के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।

परियोजना का उद्देश्य कुमाऊं के नाजुक अल्पाइन और उप-अल्पाइन क्षेत्र में मौजूद हिम तेंदुआ, कस्तूरी मृग और अन्य पर्वतीय वन्यजीवों के आवासों को सुरक्षित करना है।

कैमरा ट्रैप अध्ययन में हिमालयन सीरो, घूरल, बार्किंग डियर और लगभग 4000 मीटर ऊंचाई पर सांभर की भी मौजूदगी दर्ज हुई है। इससे पता चलता है कि इन कठिन इलाकों में शिकार की अच्छी उपलब्धता है, जो बाघ जैसे बड़े शिकारी के लिए जरूरी होती है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि बाघ कभी-कभी ऊंचाई वाले गलियारों से होकर गुजरते हैं। यह या तो क्षेत्र विस्तार की प्रक्रिया होती है या फिर किसी तरह का विस्थापन। भविष्य में लगातार निगरानी जारी रही तो शोधकर्ता समझ पाएंगे कि क्या उच्च हिमालयी पर्वतीय क्षेत्र बाघों के लिए स्थायी आवास बन सकते हैं या नहीं।


कठिन परिस्थितियों में चल रहा चुनौतीपूर्ण शोध

इस परियोजना पर काम कर रही टीम 3000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले उन इलाकों में शोध कर रही है, जहां पहुंचना ही कई घंटे की कठोर ट्रेकिंग के बाद संभव होता है।
कैमरा ट्रैप लगाना, डेटा निकालना, GIS आधारित मैपिंग तैयार करना, सुरक्षा और संचार व्यवस्था जैसे सभी काम शोधकर्ताओं को ही संभालने पड़ते हैं।

कठोर मौसम, सीमित संसाधन और महंगी लॉजिस्टिक्स के बावजूद टीम लगातार व्यवस्थित डेटा जुटा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि उच्च हिमालय के पारितंत्र को समझने और भविष्य की वन्यजीव संरक्षण रणनीतियों को मजबूत करने में यह डेटा बेहद महत्वपूर्ण साबित होगा।


निष्कर्ष

9875 फीट की ऊंचाई पर बंगाल टाइगर का दिखना सिर्फ एक दृश्य सबूत नहीं, बल्कि हिमालयी पारिस्थितिकी के लिए एक बड़ा संकेत है। इस खोज ने यह साबित कर दिया है कि वन्यजीवों की गतिविधियां हमारी कल्पना से कहीं ज्यादा व्यापक हैं और इनके संरक्षण के लिए लगातार और तकनीकी शोध बेहद जरूरी है।