देहरादून:
एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (APCR) की एक हालिया फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट में उत्तराखंड में मुसलमानों के खिलाफ बढ़ती सांप्रदायिक हिंसा, विस्थापन और सामाजिक बहिष्कार को लेकर गंभीर चिंता जताई गई है।
APCR की तथ्य-जांच टीम, जिसमें वकील, पूर्व नौकरशाह, पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता शामिल थे, ने अपनी रिपोर्ट “Excluded, Targeted & Displaced: Communal Narratives and Violence in Uttarakhand” 21 जनवरी 2026 को जारी की। रिपोर्ट में कहा गया है कि पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में “नफरत की राजनीति” के कारण मानवाधिकारों का संगठित उल्लंघन हो रहा है और संवैधानिक सुरक्षा धीरे-धीरे कमजोर की जा रही है।
रिपोर्ट में 2021 से 2025 के बीच राज्य में हुई कई सांप्रदायिक घटनाओं का दस्तावेजीकरण किया गया है। इसमें कहा गया है कि बीते कुछ वर्षों में उत्तराखंड में मुसलमानों को निशाना बनाने का एक लगातार पैटर्न सामने आया है, जो सिर्फ शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें आर्थिक और सामाजिक बहिष्कार भी शामिल है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि किस तरह “डर का रणनीतिक इस्तेमाल”, “इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करना” और राज्य की मशीनरी का उपयोग कर एक खास समुदाय के खिलाफ नफरत का माहौल बनाया गया।
हरिद्वार में 2021 में हुई ‘धर्म संसद’ में दिए गए भड़काऊ भाषणों से लेकर 2023 में उत्तरकाशी के पुरोला में कथित “लव जिहाद” की घटना के बाद पैदा हुए सांप्रदायिक तनाव तक, रिपोर्ट में पीड़ितों की गवाही को विस्तार से दर्ज किया गया है।
APCR एक गैर-लाभकारी नागरिक अधिकार संगठन है, जिसकी स्थापना वर्ष 2006 में हुई थी।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने “लैंड जिहाद”, “मजार जिहाद” जैसे अभियानों के जरिए नफरत के इस माहौल को और बढ़ाया है। साथ ही मुसलमानों के आर्थिक बहिष्कार की अपीलों को भी समर्थन दिया गया है।
रिपोर्ट जारी करते समय दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग ने तोड़फोड़ की कार्रवाइयों और चुनिंदा हमलों के पीछे की मंशा पर सवाल उठाए और पुलिस व सरकार की जवाबदेही पर जोर दिया।
उत्तराखंड के सामाजिक कार्यकर्ता शादाब आलम ने राज्य सरकार की प्राथमिकताओं को “गलत दिशा में” बताया।
उन्होंने कहा, “बेरोजगारी और पलायन जैसे असली मुद्दों पर ध्यान देने के बजाय सरकार धार्मिक ध्रुवीकरण में उलझी हुई है।”


