देहरादून। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने मंगलवार को एक अहम आदेश जारी करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह भवाली स्थित टीबी सैनिटोरियम परिसर में मल्टी-स्पेशलिटी अस्पताल के निर्माण का विस्तृत प्रस्ताव 1 दिसंबर तक अदालत में प्रस्तुत करे। अदालत यह निर्देश राज्य के सरकारी अस्पतालों में पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी को मुद्दा बनाकर दायर की गई एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया।
मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन मुखर्जी और जस्टिस शुभम उपाध्याय की खंडपीठ कर रही थी। राज्य सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता (AAG) सुनीता तमता न्यायालय में उपस्थित रहीं और आवश्यक पक्ष रखा।
याचिकाकर्ता ने बताया—2018 के आदेश का अब तक पालन नहीं
याचिकाकर्ता पक्ष की ओर से अधिवक्ता दुष्यंत मैनाली ने अदालत को बताया कि वर्ष 2018 में हाईकोर्ट ने सरकार को छह माह के भीतर भवाली टीबी सैनिटोरियम में मल्टी-स्पेशलिटी अस्पताल स्थापित करने का निर्देश दिया था, ताकि डॉक्टरों की कमी और चिकित्सा स्टाफ की समस्या दूर हो सके। लेकिन वर्षों बीत जाने के बावजूद इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हो सकी।
इसके साथ ही, नैनीताल के सामाजिक कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता दीपक रवाल की ओर से दर्ज कराई गई याचिका का भी हवाला दिया गया, जिसमें राज्य के कई अस्पतालों में डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की भारी कमी का मुद्दा उठाया गया है। याचिकाओं में बताया गया कि इससे मरीजों को समय पर उपचार नहीं मिल पा रहा और स्वास्थ्य ढांचा कमजोर हो रहा है।
अदालत ने कहा— मल्टी-स्पेशलिटी अस्पताल से होगा जनहित
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भवाली में अस्पताल बनने से न केवल नैनीताल जिले बल्कि आसपास के क्षेत्रों को भी लाभ मिलेगा। इससे मरीजों को दूर-दराज के जिलों में रेफर करने की मजबूरी कम होगी, साथ ही आपातकालीन स्थितियों में समय पर उपचार उपलब्ध होगा।
कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि डॉक्टरों और विशेषज्ञों की कमी को दूर करना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए और इस दिशा में त्वरित कदम उठाने की आवश्यकता है।
कई जिलों में डॉक्टरों की कमी पर भी नाराजगी
याचिका में यह भी बताया गया कि राज्य के 13 जिलों में डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों के स्वीकृत पद बड़े पैमाने पर खाली पड़े हैं, जो राष्ट्रीय स्वास्थ्य मानकों का स्पष्ट उल्लंघन है। अल्मोड़ा जिले के चौखुटिया सहित कई पहाड़ी क्षेत्रों में लंबे समय से चिकित्सा सेवाएँ गंभीर रूप से प्रभावित हैं और स्थानीय लोग लगातार विरोध कर रहे हैं।
न्यायालय ने इस पर चिंता व्यक्त करते हुए सरकार को इस समस्या के समाधान हेतु ठोस नीति और कार्रवाई योजना प्रस्तुत करने को कहा। मामले की अगली सुनवाई दिसंबर के पहले सप्ताह में होगी।


