देहरादून। (Kafal Tree Live) एक तरफ जहां पहाड़ों की रानी कहलाने वाला उत्तराखंड अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए दुनियाभर में मशहूर है, वहीं अब यह राज्य एक ऐसी समस्या से जूझ रहा है जिसने नागरिकों की सुरक्षा और सामाजिक सद्भाव के सवाल खड़े कर दिए हैं। आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या और उनसे होने वाले हमलों का सिलसिला अब एक डरावने मोड़ पर पहुंच चुका है। इसी ज्वलंत मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार के बाद राज्य सरकार ने एक ऐसी गाइडलाइन तैयार की है जो सड़कों पर आवारा कुत्तों को खाना खिलाने वालों के लिए सिरदर्द बनने वाली है। अब दया दिखाने की इस आदत पर कानून की निगाह पड़ने वाली है।
मामला कोई साधारण नहीं है। देश की सर्वोच्च अदालत ने आवारा कुत्तों से संबंधित मामलों में राज्य सरकारों के लचर और लापरवाह रवैये पर गहरी नाराजगी जताई है। नाराजगी इतनी कि कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का सख्त आदेश दे डाला। यह आदेश साफ जाहिर करता है कि अदालत इस मसले पर और कोई रियायत बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के इसी दबाव और गुस्से के बाद उत्तराखंड के शहरी विकास विभाग ने हड़बड़ाहट में ही सही, लेकिन एक व्यवस्थित गाइडलाइन तैयार कर ली है। इस गाइडलाइन का एक प्रावधान ऐसा है जो सीधे आम जनता से जुड़ता है और यही विवादों का सबसे बड़ा केंद्र बनने वाला है।
क्या है नई गाइडलाइन का डरावना पहलू?
शहरी विकास विभाग द्वारा जारी इस गाइडलाइन के मुताबिक, अब राज्य के हर नगरीय निकाय को प्रत्येक वार्ड में कुत्तों को भोजन कराने के लिए एक निश्चित स्थान का चयन करना होगा। यानी अब आप अपनी गली, मोहल्ले या सड़क किनारे जहां चाहें वहां आवारा कुत्तों को खाना नहीं खिला सकेंगे। अगर कोई व्यक्ति इस नियम का उल्लंघन करते हुए सड़क पर कुत्तों को खाना खिलाता पाया गया, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्यवाही का प्रावधान है।
यह फैसला उन हज़ारों पशुप्रेमियों के लिए एक झटका है, जो रोज़ाना इन जानवरों को भोजन कराना अपना धर्म समझते हैं। लेकिन सरकार का तर्क है कि यह कदम सार्वजनिक सुरक्षा और स्वच्छता को ध्यान में रखकर उठाया जा रहा है। इस संबंध में तैयार नीति से जुड़ा हलफनामा शीघ्र ही सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया जाएगा।
कुत्तों के साथ क्या होगा? नसबंदी से लेकर शेल्टर होम तक
गाइडलाइन में सिर्फ खाना खिलाने पर पाबंदी ही नहीं है, बल्कि आवारा कुत्तों के प्रबंधन के लिए एक व्यापक रणनीति भी तैयार की गई है। शहरी विकास निदेशक विनोद गिरि गोस्वामी ने बताया कि नगर निकायों को निर्देश दिया गया है कि पकड़े गए कुत्तों की नसबंदी (ABC कार्यक्रम) और टीकाकरण के बाद उन्हें वापस उसी इलाके में छोड़ दिया जाए। इससे उनकी आबादी पर नियंत्रण और रेबीज जैसी बीमारियों से बचाव possible हो सकेगा।
लेकिन, हर कुत्ता शांतिप्रिय नहीं होता। इस बात को स्वीकारते हुए गाइडलाइन में साफ किया गया है कि अगर कोई कुत्ता आक्रामक है या फिर रेबीज जैसी खतरनाक बीमारी से संक्रमित पाया जाता है, तो उसे स्थायी रूप से डॉग शेल्टर होम में रखा जाएगा। साथ ही, लोगों की शिकायतों के निपटारे के लिए नगर निकायों को एक हेल्पलाइन नंबर भी जारी करना अनिवार्य होगा।
क्या मिलेगी आवारा कुत्तों को गोद लेने की छूट?
गाइडलाइन में पशुप्रेमियों के लिए एक राहत की बात भी शामिल है। अब कोई भी व्यक्ति जो इन आवारा कुत्तों को अपने घर में पालना चाहता है, वह उन्हें गोद ले सकता है। इसके लिए संबंधित नगर निकाय में आवेदन देना होगा। यह कदम एक तरफ जहां इन कुत्तों को एक स्थायी घर देने में मददगार साबित हो सकता है, वहीं सड़कों पर इनकी संख्या को कम करने में भी सहायक होगा।
इस पूरी योजना पर अमल के लिए शहरी विकास विभाग ने सभी नगर निकायों से उनके पास मौजूद ढांचागत संसाधनों का ब्योरा मांगा है। इसमें डॉग शेल्टर की संख्या, पशु चिकित्सकों की उपलब्धता, कुत्ता पकड़ने वाले प्रशिक्षित कर्मचारी और वाहनों आदि की जानकारी शामिल है।
स्पष्ट है कि उत्तराखंड सरकार अब इस मुद्दे पर गंभीर है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह गाइडलाइन सड़कों पर छाई इस ‘आवारा समस्या’ का स्थायी समाधान ढूंढ पाएगी? और क्या गली-मोहल्लों में खाना खिलाने पर पाबंदी वाकई एक कारगर कदम साबित होगी, या फिर यह एक नए सामाजिक तनाव को जन्म देगी? आने वाला वक्त ही इस सख्त गाइडलाइन की असली परीक्षा लेगा।


