सरकार शिक्षा के अधिकार की बात करती है, डिजिटल इंडिया का सपना दिखाती है। लेकिन उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के एक दूरदराज के गाँव की कहानी सरकारी दावों के झूठे आइने की तरह है, जिसमें टूटी हुई उम्मीदों और सिस्टम की संवेदनहीनता का सच साफ दिखाई देता है। यह कहानी है प्राथमिक विद्यालय अनरगांव, गंगोलीहाट की, जहाँ दो साल से बच्चों की पाठशाला एक किराए की दुकान में लग रही है।
जब रात में धड़ाम से गिर गया स्कूल का भवन!
यह कोई साधारण घटना नहीं, बल्कि एक ऐसी त्रासदी की शुरुआत है जो आज तक थमी नहीं है। दो साल पहले एक रात, आपदा ने अपना रूप दिखाया और स्कूल का भवन भरभराकर गिर पड़ा। सबसे बड़ा सौभाग्य यही था कि वह भीषण घटना दिन में नहीं, रात में घटी। अगर ऐसा दिन में होता, तो शायद कई मासूम जिंदगियाँ मलबे में दब जातीं। यह सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। लेकिन इस हादसे ने सिस्टम की आँखें नहीं खोलीं। सरकारी महकमे की नींद आज भी गहरी बनी हुई है।
गाँव वालों ने उठाया बीड़ा, एक दुकान बन गई ‘विद्यालय’
जब सरकारी तंत्र सोया रहा, तब गाँव के लोगों ने हिम्मत दिखाई। बच्चे हफ्तों तक घरों में बैठे रहे, उनका भविष्य अधर में लटक गया। तब अनरगांव के ही एक ग्रामीण श्याम सिंह सामने आए। भविष्य की इस पीढ़ी को अंधकार में नहीं छोड़ सकते थे। उन्होंने अपनी दुकान बिना किसी शुल्क के, बच्चों की पढ़ाई के लिए दे दी। और यहीं से शुरू हुई एक नई, मगर दर्द भरी ‘पाठशाला’ की कहानी। जहाँ आज भी असली स्कूल भवन खंडहर बना हुआ है, वहीं यह दुकान शिक्षा की एकमात्र किरण बनकर चमक रही है।
एक ही कमरे में सिमटा पूरा स्कूल, मिड-डे मील का धुआँ और शिक्षक की चॉक!
इस ‘स्कूल’ का नज़ारा किसी दिल दहला देने वाले दृश्य से कम नहीं है। पाँच अलग-अलग कक्षाओं के कुल सात बच्चे एक ही छोटे से कमरे में बैठते हैं। एक तरफ शिक्षक ब्लैकबोर्ड पर पढ़ा रहे हैं, तो दूसरे ही कोने में भोजन माता मिड-डे मील बना रही हैं। एक ही जगह पर चॉक की खुशबू और खाना बनने की गंध मिल जाती है। न तो किताबों को रखने की कोई उचित जगह है, और न ही इन मासूमों के खेलने के लिए कोई मैदान। यह छोटी सी दुकान उनकी पूरी दुनिया बनकर रह गई है।
क्या कहते हैं अधिकारी?
जब इस पूरे मामले की जानकारी जिला बेसिक शिकिक्षा अधिकारी (बीएसए) तरुण पंत से ली गई, तो उन्होंने एक बार फिर से वही पुराना आश्वासन दोहराया। उनके मुताबिक, प्राथमिक विद्यालय अनरगांव के नए भवन के लिए बजट की गणना तैयार कर शासन को भेजी जा चुकी है और स्वीकृति मिलते ही निर्माण कार्य शुरू करा दिया जाएगा। सवाल यह है कि आखिर यह ‘स्वीकृति’ आने में दो साल क्यों लग गए? और आने वाले बच्चों का भविष्य कब तक इसी ‘आश्वासन’ पर निर्भर रहेगा?
अनरगांव के इन बच्चों की कहानी सिर्फ एक इमारत के गिरने की नहीं, बल्कि एक व्यवस्था के मूल्यों के ध्वस्त होने की कहानी है। यह सवाल करती है कि क्या हमारे बच्चों का भविष्य सचमुच हमारी प्राथमिकता है, या सिर्फ चुनावी भाषणों तक सीमित है?


