कल्पना कीजिए वो पल… आपकी कार उत्तराखंड की सीमा में प्रवेश करती है। हरे-भरे पेड़, दूर नजर आती बर्फ से ढकी चोटियाँ, और ताजी हवा के झोंके… लेकिन अब, इस खूबसूरत एहसास से पहले एक नया ‘पहरेदार’ खड़ा हो गया है। एक ऐसा पहरेदार जो सीधा आपकी जेब पर डाका डालेगा, लेकिन उसका मकसद आपकी जेब नहीं, बल्कि इन्हीं पहाड़ों, इन्हीं नदियों और इसी स्वच्छ हवा को बचाना है। यह पहरेदार है – उत्तराखंड का नया ‘ग्रीन टैक्स’!
देवभूमि उत्तराखंड अब सख्त हो रही है। इस दिसंबर से, राज्य में प्रवेश करने वाले हर वाहन को एक अतिरिक्त ‘हरित कर’ चुकाना होगा। सरकार का यह फैसला एक बड़े संकट की आहट है। एक ऐसा संकट जो हर साल लाखों पर्यटकों की भीड़ के साथ पहाड़ों पर थोप दिया जाता है – “वाहनों का बेतहाशा प्रदूषण।”
क्या है यह ग्रीन टैक्स? जानिए आपको कितना चुकाना होगा
यह कोई एक जैसा टैक्स नहीं है। यह आपके वाहन के आकार और उसके प्रदूषण फैलाने की क्षमता पर निर्भर करेगा। राज्य परिवहन विभाग द्वारा जारी दरें एक स्पष्ट संदेश देती हैं:
- छोटी व्यक्तिगत कारें: ₹80
- छोटे माल ढुलाई वाहन: ₹250
- बसें: ₹140
- ट्रक: ₹120 से लेकर ₹700 तक (उनकी भार क्षमता के आधार पर)
ये रकम सिर्फ एक Entry Ticket नहीं है। यह उस पर्यावरणीय क्षति की ‘कीमत’ है, जो आपका वाहन इन नाजुक पहाड़ी इलाकों में पहुँचकर कर सकता है।
लेकिन सवाल यह है: यह टैक्स वसूला कैसे जाएगा? कहीं सीमा पर लंबी लाइनें तो नहीं लगेंगी?
इसका जवाब दे रहे हैं राज्य के अतिरिक्त परिवहन आयुक्त श्री सनत कुमार सिंह। उनके अनुसार, इस पूरी प्रक्रिया में तकनीक का जादू काम करेगा। सीमा चौकियों पर लगे कैमरे Automatic Number Plate Recognition (ANPR) तकनीक के जरिए प्रवेश कर रहे हर वाहन का रजिस्ट्रेशन नंबर पकड़ लेंगे।
यह डेटा सीधे एक प्राइवेट वेंडर के सॉफ्टवेयर में जाएगा, जो पल भर में पहचान लेगा कि कौन-सा वाहन उत्तराखंड का है, कौन-सा इलेक्ट्रिक या सीएनजी से चल रहा है, या फिर कोई एम्बुलेंस या फायर ब्रिगेड का वाहन है। इन सभी को इस टैक्स से छूट मिलेगी। बाकी बचे वाहनों की जानकारी NPCI के डेटाबेस में भेजी जाएगी और आपके बैंक खाते से टैक्स की रकम स्वतः ही काट ली जाएगी। मतलब, आपको रुकने की भी जरूरत नहीं। यह सिस्टम बिना रुके, बिना भीड़ बढ़ाए, एक चुपचाप संदेश देगा – “आपने प्रकृति के लिए अपना योगदान दे दिया है।”
असली मुद्दा: क्या सचमुच मदद करेगा यह ग्रीन टैक्स पर्यावरण की?
यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण है। इसका जवाब ‘हाँ’ में देने के पीछे कई तर्क हैं:
- प्रदूषण पर लगाम: मसूरी, नैनीताल, लैंसडाउन जैसे लोकप्रिय हिल स्टेशनों पर वाहनों का दबाव इतना बढ़ गया है कि अब वहाँ की हवा में भी प्रदूषण की मात्रा खतरनाक स्तर तक पहुँच रही है। यह टैक्स एक साइकोलॉजिकल बैरियर बनेगा, जो कुछ लोगों को ‘क्या जरूरत है?’ सोचने पर मजबूर कर सकता है।
- फंड का सृजन: यह सिर्फ रोकथाम की कवायद नहीं है। इससे जो कर एकत्र होगा, उसे सीधे पर्यावरण संरक्षण, पहाड़ों की सफाई, और टिकाऊ परिवहन ढाँचे (जैसे इलेक्ट्रिक व्हीकल इन्फ्रास्ट्रक्चर) के विकास पर खर्च किया जाएगा। यह पैसा सीधे प्रकृति की सेवा में लगेगा।
- जिम्मेदार यात्रा को बढ़ावा: यह कदम पर्यटकों में एक जिम्मेदारी का अहसास पैदा करेगा। आप सिर्फ प्रकृति का आनंद लेने नहीं आ रहे, बल्कि उसकी सुरक्षा में अपना छोटा-सा योगदान भी दे रहे हैं।
निष्कर्ष: एक दर्दभरा पर जरूरी इलाज
उत्तराखंड का ग्रीन टैक्स एक दर्दभरी गोली की तरह है। कोई भी अतिरिक्त टैक्स देना पसंद नहीं करता। यह पर्यटकों के लिए एक अतिरिक्त खर्च जरूर है, लेकिन अगर हम आँखें मूंदकर देखें तो पाएंगे कि यह उस नश्वर हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के लिए जरूरी इलाज है, जिसे हम बचाना चाहते हैं।
यह सिर्फ एक शुरुआत है। एक चेतावनी है। एक संकेत है कि अब देवभूमि की रक्षा के लिए सख्त कदम उठाने का वक्त आ गया है। क्या आपको नहीं लगता कि अपने पसंदीदा हिल स्टेशनों की सुंदरता और स्वच्छता को बनाए रखने के लिए यह छोटा-सा योगदान देना उचित है?
आप क्या सोचते हैं? क्या उत्तराखंड का ग्रीन टैक्स वाकई में पर्यावरण को बचाने का सही तरीका है? नीचे कमेंट करके अपनी राय जरूर बताएं।


