देहरादून: उत्तराखंड में आपदाओं के बढ़ते चक्र पर एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है। सोशल डेवलपमेंट फॉर कम्युनिटी फाउंडेशन (एसडीसी) द्वारा जारी उत्तराखंड डिजास्टर एंड एक्सीडेंट एनालिसिस इनिशिएटिव (UDAAI) की ताजा रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि साल 2025 के मानसून के आखिरी तीन महीनों (जुलाई, अगस्त, सितंबर) ने राज्य के सामने भविष्य की एक डरावनी तस्वीर पेश की है। रिपोर्ट के अनुसार, अव्यवस्थित विकास, नाजुक भूगोल और चरम मौसमी घटनाएं उत्तराखंड को लगातार एक गहराते आपदा चक्र में धकेल रही हैं।
ग्लेशियर से शुरू हुआ सिलसिला, मैदान पर आकर रुका
रिपोर्ट में मानसून के इन तीन महीनों में घटी घटनाओं के पैटर्न पर गौर किया गया है। जुलाई महीने की शुरुआत उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) के खतरे की चेतावनियों से हुई। वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान ने भी इन झीलों के सक्रिय होने पर चिंता जताई थी।
अगस्त आते-आते यह खतरा ठोस रूप लेता दिखा। धराली में आई भीषण बाढ़ ने पूरे देश का ध्यान खींचा, जहाँ कई लोग लापता हो गए और एक पूरे कस्बे का नक्शा बदल गया। इसी दौरान पौड़ी जिले में भी बड़े पैमाने पर तबाही देखने को मिली, हालाँकि यह धराली की त्रासदी के आगे कुछ ओझल रह गई।
सितंबर में मैदानी इलाकों में टूटा कहर
सितंबर महीने तक आते-आते आपदा का यह सिलसिला मैदानी इलाकों तक पहुँच गया। देहरादून घाटी में सहस्रधारा और मालदेवता क्षेत्रों में हुई मूसलाधार बारिश ने भीषण तबाही मचाई। इस घटना में 27 लोगों की मौत हुई और 16 लोग लापता हो गए। कई पुल और सड़कें बह गईं, जिससे मसूरी और आसपास के इलाकों में हजारों लोग फंस गए। केदारनाथ मार्ग पर भी भूस्खलन की घटनाओं में तीर्थयात्रियों की मौत ने एक बार फिर सुरक्षा इंतजामों पर सवाल खड़े किए।
प्रशासनिक लापरवाही पर उठे सवाल
UDAAI रिपोर्ट ने सिर्फ प्राकृतिक घटनाओं का ही विश्लेषण नहीं किया, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, अत्यधिक संवेदनशील वसुधारा ग्लेशियल झील पर सर्वेक्षण पूरा होने के 11 महीने बीत जाने के बाद भी वहाँ अर्ली वार्निंग सिस्टम नहीं लगाया गया।
इसके अलावा, श्रीनगर में 16,200 करोड़ रुपए की लागत से चल रही ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना की ब्लास्टिंग और सुरंग निर्माण के कारण स्थानीय निवासियों के मकानों में दरारें आ गईं, जिससे उन्हें अपना घर छोड़ने को मजबूर होना पड़ा। बदरीनाथ हाईवे पर लगातार भूस्खलन से आवागमन का प्रभावित होना भी विकास के गलत तरीकों की ओर ही इशारा करता है।
विशेषज्ञों की चेतावनी: “आपदाएं अब ज्यादातर मानवजनित”
रिपोर्ट में विशेषज्ञों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि अवैज्ञानिक निर्माण पहाड़ी ढलानों की स्थिरता को कमजोर कर रहा है। आईपीसीसी के लेखक अंजल प्रकाश और पर्यावरण कार्यकर्ता सुरेश भाई ने कहा कि ऐसी परियोजनाएं सुरक्षा के बजाय आपदा का कारण बनती जा रही हैं।
एसडीसी फाउंडेशन के संस्थापक अनूप नौटियाल ने कहा, “दून घाटी की बाढ़ और पहाड़ों की अस्थिरता अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं, बल्कि यह हमारे अस्थिर विकास मॉडल की चेतावनी है। उत्तराखंड की आपदाएं अब ज्यादातर मानवजनित हैं। यदि हमने पारिस्थितिकीय संवेदनशीलता, आपदा की तैयारी और जलवायु परिवर्तन पर ध्यान नहीं दिया तो स्थिति और गंभीर होगी।“
धराली: त्रासदी के 50 दिन बाद भी वीरान पड़ा गांव
रिपोर्ट में एक मार्मिक बिंदु यह भी उजागर हुआ है कि धराली त्रासदी को 50 दिन बीत जाने के बाद भी कभी जीवंत रहा यह गाँव आज वीरान पड़ा है। यह न केवल मानवीय क्षति का प्रतीक है, बल्कि राज्य की धीमी पुनर्वास प्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
यह UDAAI की 36वीं मासिक रिपोर्ट है, जो लगातार तीन सालों से उत्तराखंड की आपदाओं और जलवायु घटनाओं का दस्तावेजीकरण कर रही है। संस्था जल्द ही जुलाई-सितंबर 2025 की एक विस्तृत त्रैमासिक रिपोर्ट जारी करेगी, जो उत्तराखंड के 25वें राज्य स्थापना दिवस के अवसर पर जारी की जाएगी और राज्य में लचीलापन एवं सतत विकास पर एक गहन विमर्श को प्रोत्साहित करेगी।


