भारत त्यौहारों और रीति-रिवाजों का देश है, जहाँ हर परंपरा के पीछे कोई न कोई गहरा अर्थ और विश्वास छुपा होता है। दिवाली के पांच दिनों के उत्सव के बाद जहाँ सभी लोग अपने-अपने घरों में शांति और व्यवस्था की बात करते हैं, वहीं कर्नाटक का एक गाँव इससे उलट एक ऐसा अनूठा और रोमांचकारी त्यौहार मनाता है जो देखने और सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन यहाँ की आस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस त्यौहार का नाम है गोरेहब्बा, जिसे आम बोलचाल में ‘गोबर की होली’ भी कहा जाता है।
क्या है गोरेहब्बा त्यौहार?
दिवाली के अगले दिन, कर्नाटक और तमिलनाडु की सीमा पर बसे गाँव गुमटापुरा में गोरेहब्बा का यह उत्सव बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। स्पेन के टमाटर फेंकने वाले प्रसिद्ध ‘ला टोमाटीना’ त्यौहार की तरह, गोरेहब्बा में लोग एक-दूसरे पर गोबर के गोले फेंकते हैं। यह कोई झगड़ा नहीं बल्कि खुशी, उल्लास और आपसी प्रेम जताने का एक अद्भुत तरीका है।
त्यौहार की रस्में और तैयारी
इस त्यौहार की शुरुआत दोपहर में ही हो जाती है। गाँव के युवक ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में सवार होकर पूरे गाँव का चक्कर लगाते हैं और गाँव वालों से गाय के ताजे गोबर का ‘अस्त्र-शस्त्र’ एकत्र करते हैं। इस दौरान पूरे गाँव में एक अलग ही प्रकार का उत्साह देखने को मिलता है।
इसके बाद, एकत्रित किए गए गोबर को गाँव के मुख्य मंदिर में ले जाया जाता है जहाँ पुजारी एक विशेष पूजा-अर्चना करके इस गोबर को पवित्र करते हैं। इस पूजा के बाद ही इस ‘पवित्र गोबर’ को एक खुले मैदान में डाल दिया जाता है। यहीं से शुरू होती है असली मस्ती।
शुरू होती है ‘गोबर-युद्ध’
पूजा के बाद जैसे ही गोबर का ढेर मैदान में डाला जाता है, सैकड़ों की संख्या में इकट्ठे हुए पुरुष और बच्चे उस ढेर पर टूट पड़ते हैं। हर कोई बर्फ के गोले (स्नोबॉल) की तरह गोबर के गोले बनाता है और अपने आस-पास मौजूद हर व्यक्ति पर उन्हें उछालने लगता है। देखते ही देखते पूरा मैदान और उसमें मौजूद सभी लोग गोबर से सन जाते हैं। यह दृश्य अविश्वसनीय और दिलचस्प होता है।
सिर्फ मस्ती नहीं, है गहरा विश्वास
बाहर से देखने पर यह सिर्फ एक मस्ती भरा अजीबोगरीब खेल लग सकता है, लेकिन स्थानीय लोगों की इसके पीछे एक गहरी आस्था है। यहाँ के लोगों का मानना है कि गाय और उससे निकलने वाली हर चीज पवित्र और स्वास्थ्यवर्धक होती है। उनका विश्वास है कि इस ‘गोबर-युद्ध’ में शामिल होने से शरीर की कई बीमारियाँ दूर होती हैं और त्वचा संबंधी रोग ठीक होते हैं।
गाँव के एक किसान माहेश ने इस बारे में बताया, “यह हमारी सदियों पुरानी परंपरा है। हमारा मानना है कि गौ माता का गोबर पवित्र होता है और अगर किसी को कोई बीमारी है, तो यह उसे ठीक कर देगा।”
राष्ट्रीय संदर्भ और महत्व
गोरेहब्बा त्यौहार सिर्फ एक स्थानीय परंपरा नहीं बल्कि भारत में गौ-संरक्षण और गौ-उत्पादों के महत्व को भी रेखांकित करता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गौ रक्षा और गौ-आधारित अर्थव्यवस्था (Cow-based Economy) पर लगातार जोर दिया है। केंद्र सरकार गोबर और गौमूत्र से बने उत्पादों जैसे मच्छर भगाने वाली अगरबत्तियाँ, शैम्पू, टूथपेस्ट आदि को बढ़ावा दे रही है। ऐसे में, गोरेहब्बा जैसा त्यौहार गाय के सर्वोच्च महत्व को प्रदर्शित करता है।
गोरेहब्बा त्यौहार भारत की सांस्कृतिक विविधता और लोकाचार का एक जीवंत उदाहरण है। यह साबित करता है कि भारत के कोने-कोने में अब भी ऐसी अद्भुत परंपराएँ जीवित हैं जो आधुनिक दौर में भी अपनी जड़ों से जुड़ी हुई हैं। यह त्यौहार सिर्फ गोबर फेंकने का नहीं, बल्कि सामुदायिक सद्भाव, आस्था और प्रकृति के प्रति सम्मान का एक बेहतरीन उत्सव है। अगली बार जब दिवाली आए, तो याद रखिएगा कि दीयों और पटाखों के अलावा भी इसका एक और, बिल्कुल अलग और अनोखा रंग भी है।
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