दुनिया की उन चुनिंदा जगहों में से एक, जहाँ मच्छरों का नामोनिशान तक नहीं था, आइसलैंड (Iceland) ने इसी महीने पहली बार मच्छरों को देखे जाने की पुष्टि की है। वैज्ञानिकों ने तीन मच्छरों (दो मादा और एक नर) की खोज की घोषणा की है। यह खोज कीओस शहर के एक बगीचे में कीट-प्रेमी बियोर्न हयाल्टासन (Björn Hjaltason) ने की। उन्होंने एक स्थानीय अखबार को बताया, “मैं तुरंत समझ गया कि यह कुछ ऐसा है जो मैंने पहले कभी नहीं देखा।”
हालाँकि यह अभी पुष्टि नहीं हुई है कि मच्छर आइसलैंड कैसे पहुँचे, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि बढ़ता तापमान (Rising Temperatures) आइसलैंड को इन कीड़ों के लिए अधिक रहने लायक बना रहा है। यह घटना जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के स्पष्ट प्रभावों में से एक है।
मच्छर और तापमान का नाता
मच्छर, सभी आर्थ्रोपोड्स की तरह, ठंडे-खून वाले जीव (Cold-Blooded Creatures) होते हैं और वे अपने शरीर का तापमान आसपास के माहौल के अनुसार नियंत्रित नहीं कर सकते। इसलिए, तापमान उनकी गतिविधि का सबसे बड़ा नियंत्रक है और उनकी अधिकांश प्रजातियाँ गर्म मौसम में ही पनपती हैं।
यही कारण है कि ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) ने इन कीड़ों के फलने-फूलने का रास्ता खोल दिया है। कई अध्ययनों से पता चला है कि बढ़ते तापमान के साथ, मच्छर उन आवासों पर भी हमला बोल सकते हैं और पनप सकते हैं, जो कभी उनके लिए प्रतिकूल माने जाते थे। आइसलैंड इसका जीवंत उदाहरण बन गया है।
गर्मी कैसे बढ़ा रही है मच्छरों का दायरा?
ग्लोबल वार्मिंग सिर्फ मच्छरों की संख्या बढ़ाने या उन्हें लंबे समय तक जीवित रखने में ही मदद नहीं कर रही है, बल्कि इसका उनकी प्रजनन क्षमता (Reproductive Capacity) पर भी सीधा असर पड़ रहा है।
- तेज़ी से बढ़त: एक अध्ययन के मुताबिक, तापमान में वृद्धि मच्छरों के अंडों के फूटने और लार्वा के विकास को तेज कर देती है, जिससे वयस्क होने का समय कम हो जाता है। इससे बीमारियों के फैलने की दर भी बढ़ जाती है।
- बार-बार काटने की आदत: गर्म मौसम में, मच्छर अधिक बार काटने लगते हैं। केवल मादा मच्छर ही “ब्लड मील” के लिए इंसानों को काटती हैं – वे अपने अंडे पैदा करने के लिए हमारे खून से प्रोटीन लेती हैं। उच्च तापमान खून पचने की दर को तेज कर देता है, जिससे मच्छर जल्दी-जल्दी भूखे होते हैं और अधिक काटते हैं।
- नमी की भूमिका: बढ़ी हुई नमी (Humidity) भी उनके व्यवहार को बदलने में भूमिका निभाती है। शोध बताते हैं कि गर्म और नम दिनों में मच्छरों की गतिविधि चरम पर होती है। 42% या उससे अधिक की नमी और 10-35 डिग्री सेल्सियस के बीच का तापमान मच्छरों के लिए आदर्श माना जाता है। उच्च नमी मच्छरों की भोजन ग्रहण करने की क्षमता, उनके जीवित रहने और अंडे के विकास से जुड़ी हुई है।
क्या बहुत ज़्यादा गर्मी नुकसानदेह है?
हाँ, मच्छर बहुत गर्म और शुष्क परिस्थितियों के प्रति संवेदनशील होते हैं। 32 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान पर उनकी गतिविधि धीमी पड़ने लगती है और साथ ही वेक्टर जनित बीमारियों का फैलाव भी कम हो जाता है। उदाहरण के लिए, मलेरिया फैलने का सबसे ज़्यादा खतरा 25 डिग्री सेल्सियस पर होता है, जबकि जीका का खतरा 29 डिग्री सेल्सियस पर सबसे अधिक होता है। इससे अधिक तापमान पर मच्छर संघर्ष करने लगते हैं।
स्टैनफोर्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक, “अच्छी खबर यह है कि उच्च वैश्विक तापमान, उन जगहों पर जो वर्तमान में अपेक्षाकृत गर्म हैं, वेक्टर जनित बीमारियों के फैलने की संभावना को कम कर देगा। बुरी खबर यह है कि यह गर्मी उन सभी जगहों पर बीमारियों के फैलने की संभावना बढ़ा देगी, जो वर्तमान में अपेक्षाकृत ठंडी हैं।” और आइसलैंड इसी ‘बुरी खबर’ का शिकार हो रहा है।
आइसलैंड पर ग्लोबल वार्मिंग का क्या असर पड़ रहा है?
आइसलैंड वर्तमान में उत्तरी गोलार्ध की बाकी दुनिया की तुलना में चार गुना तेजी से गर्म हो रहा है। इसके कारण ग्लेशियरों का अभूतपूर्व पिघलना और लगातार लू का चलना जैसी घटनाएं बढ़ी हैं।
2024 में, देश ने अपने उच्च तापमान के कई रिकॉर्ड तोड़े। आइसलैंड में मई के महीने में 20 डिग्री सेल्सियस से अधिक का तापमान कभी-कभार ही देखने को मिलता था, और जब मिलता था भी, तो यह गर्मी की लहरें महज दो से तीन दिनों तक रहती थीं। हालाँकि, इस साल देश के अलग-अलग हिस्सों में यह सीमा लगातार 10 दिनों तक पार की गई। आइसलैंड ने मई में अपना अब तक का सबसे गर्म दिन भी देखा, जब एग्लिसस्टाडिर हवाई अड्डे पर तापमान 26.6 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया।
आइसलैंड में मच्छरों का मिलना सिर्फ एक कीट का आगमन नहीं है, बल्कि यह एक चेतावनी है। यह दर्शाता है कि जलवायु परिवर्तन कितनी तेजी से दुनिया के सबसे सुदूर और प्रतिकूल माने जाने वाले इलाकों को भी बदल रहा है। इस छोटी सी घटना के बड़े निहितार्थ हैं, जो भविष्य में स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए नई चुनौतियाँ पेश कर सकते हैं। आइसलैंड का उदाहरण स्पष्ट करता है कि ग्लोबल वार्मिंग सिर्फ एक अमूर्त अवधारणा नहीं है, बल्कि एक ऐसी सच्चाई है जो अब हमारे दरवाजे पर दस्तक दे रही है, और उस दस्तक में मच्छरों की भनभनाहट भी शामिल हो गई है।


