उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में स्थित दूर-दराज़ और सुदूर व्यास घाटी (Vyas Valley) ने पिछले एक दशक में पर्यटन के मामले में एक अभूतपूर्व कायापलट देखा है। जहाँ 2015 में मुश्किल 200 पर्यटक इस क्षेत्र का रुख करते थे, वहीं 2024 में यह संख्या बढ़कर लगभग 30,000 तक पहुँच गई है। इस उछाल के पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अक्टूबर 2023 में आदि कैलाश (Adi Kailash) की यात्रा को एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है, जिसने इस क्षेत्र को राष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया।
क्या है व्यास घाटी? (What is Vyas Valley?)
11,800 फीट की ऊँचाई पर स्थित यह घाटी अपनी कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और अलग-थलग पड़े होने के लिए जानी जाती थी। यह घाटी सात मनमोहक गाँवों—बुडी, गरब्यांग, नापालच्यू, गुन्जी, नबी, रोंगकोंग और कूति—से मिलकर बनी है। आधिकारिक आँकड़े बताते हैं कि 2022 में यहाँ 1,757, 2023 में 10,025 और 2024 में 29,352 पर्यटक पहुँचे। इस साल अक्टूबर तक ही 23,576 पर्यटक आ चुके हैं और अनुमान है कि साल का अंत होते-होते यह संख्या 30,000 को पार कर जाएगी। राज्य सरकार इसे सीमावर्ती पर्यटन (Border Tourism) में ‘क्रांतिकारी बदलाव’ करार दे रही है।
पलायन पर लगाम, आर्थिक क्रांति का दौर (Reverse Migration and Economic Boom)
पर्यटन की इस बाढ़ का सबसे सकारात्मक प्रभाव स्थानीय लोगों के जीवन पर पड़ा है। इसने ‘रिवर्स माइग्रेशन’ (Reverse Migration) यानी पलायन को उलटने का काम किया है। वे ग्रामीण जो रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर गए थे, अब वापस अपने गाँव लौट रहे हैं। लोग अब होमस्टे (Homestay in Vyas Valley) खोल रहे हैं, टैक्सी सर्विस चला रहे हैं और गाइड का काम कर रहे हैं।
कुटी गाँव के निवासी और आदि कैलाश मंदिर के पुजारी हरिश कुटियाल के मुताबिक, “2020 से पहले, गाँव की 190 में से केवल 25 परिवार ही यहाँ रह गए थे। आज, पर्यटन से मिलने वाले नए आय के अवसरों के चलते कुटी में 130 परिवार रहते हैं।” आदि कैलाश टैक्सी यूनियन के अध्यक्ष प्रवेश नबियाल ने इस बात की पुष्टि करते हुए कहा कि रिटायर्ड लोग और स्थानीय निवासी होमस्टे और टैक्सी सेवाएँ शुरू करने के लिए लौट रहे हैं। दिल्ली से आदि कैलाश और ओम पर्वत (Om Parvat) के लिए सीधी हेली-दर्शन उड़ानों जैसी पहलों ने इस क्षेत्र को और अधिक सुलभ बना दिया है।
विकास के प्रयास और सरकारी योजनाएँ (Development Efforts and Government Initiatives)
बढ़ते पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने 17 करोड़ रुपये का बजट अवसंरचना विकास (Infrastructure Development in Uttarakhand) के लिए आवंटित किया है। इसमें कॉटेज, एक संग्रहालय, एक ध्यान केंद्र और लैंडस्केपिंग शामिल है। पर्यटन सचिव धीराज सिंह गर्केब्याल अनुसार, “सड़कों, कैफेटेरिया और ओपन-एयर थिएटरों की योजना सावधानीपूर्वक बनाई जा रही है। नाबी जैसे गाँवों में, जहाँ पहले केवल 60 बिस्तर उपलब्ध थे, अब 600 से अधिक बिस्तरों की सुविधा है – यह बदलाव के पैमाने का एक स्पष्ट संकेत है। हालाँकि, हम यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि केवल नियोजित गतिविधियाँ ही की जाएँ।”
पर्यावरण पर मंडराता खतरा (The Looming Environmental Threat)
इस उछाल के साथ ही पर्यावरणविदों ने नाजुक हिमालयी पारिस्थितिकी (Fragile Himalayan Ecosystem) के लिए गहरी चिंता जताई है। उनका कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में पर्यटकों का आना इस क्षेत्र के लिए अस्थिर हो सकता है। उन्होंने चेतावनी दी है कि जब तक पर्यटकों की संख्या पर नियंत्रण नहीं किया जाता, “पर्यटकों को आकर्षित करने वाली प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत ही खतरे में पड़ सकती है।” चुनौती आर्थिक लाभ और घाटी की पारिस्थितिक व सामाजिक सीमाओं के बीच संतुलन बनाने की है।
पद्म भूषण से सम्मानित पर्यावरणविद् अनिल जोशी (Anil Joshi) ने कहा, “राज्य के वित्तीय स्वास्थ्य के लिए पर्यटन महत्वपूर्ण है, लेकिन पर्यावरण को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। व्यास जैसी दूरस्थ घाटियाँ हजारों लोगों को समायोजित करने के लिए नहीं बनी हैं। अनियंत्रित आवाजाही की अनुमति देने के बजाय आगंतुकों को सीमित और विभाजित करना कहीं अधिक व्यावहारिक है।” जोशी ने यह भी कहा कि स्वतंत्रता के बाद से नए पर्यटन स्थलों के अभाव ने मौजूदा स्थलों पर दबाव बढ़ा दिया है।
निष्कर्ष: सतत विकास की ओर (Conclusion: Towards Sustainable Development)
व्यास घाटी की कहानी दोहरी चुनौती प्रस्तुत करती है। एक तरफ जहाँ यह सुदूर क्षेत्रों में पर्यटन द्वारा लाई गई आर्थिक समृद्धि की एक सफल मिसाल है, वहीं दूसरी तरफ यह एक चेतावनी भी है। इसकी सफलता तभी सार्थक होगी जब प्राकृतिक सौंदर्य और स्थानीय संस्कृति को बचाए रखते हुए सतत पर्यटन (Sustainable Tourism in Himalayas) पर जोर दिया जाएगा। भविष्य की राह सतत विकास और सावधानीपूर्वक योजना से ही निकलेगी।


